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अष्टभुजा शुक्ल को वर्ष 2009 का केदार सम्मान


वर्धा 28 जुलाई, 2010: प्रगतिशील काव्य परंपरा के महत्वपूर्ण कवि केदारनाथ अग्रवाल की स्मृति में दिए जाने वाले केदार सम्मान वरिष्ठ कवि अष्टभुजा शुक्ल को प्रदान किया जाएगा। केदार सम्मान के निर्णायक मंडल के सदस्य वरिष्ठ आलोचक मैनेजर पाण्डेय, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति वरिष्ठ साहित्यकार विभूति नारायण राय, कवि राजेश जोशी, आलोचक विजय कुमार, साहित्यकार भारत भारद्वाज ने वर्ष 2009 का यह गौरव सम्मान वर्ष 2004 में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित 'दु:स्वप्न भी आते हैं' के लिए चुना है। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश बस्ती जिला के दीक्षापार गांव में 08 अक्टूवर 1957 ई. में जन्मे अष्टभुजा शुक्ल चित्राखोर के संस्कृत महाविद्यालय में अध्यापन कार्य से जुड़े हैं। हिंदी, संस्कृत, बंगला, गुजराती, अंग्रेजी भाषा के जानकार शुक्ल की पांच संग्रह (पद-कुपद, चैत के बादल, दु:स्वप्न भी आते हैं, इसी हवा में अपनी भी दो-चार सांस है, निबंध संग्रह मिथउवा) रचना संसार में शामिल हैं। हाल ही में प्रकाशित उनके पदों का संग्रह 'पद-कुपद' काफी चर्चित रहा है। कुलपति विभूति नारायण राय ने कहा कि अष्टभुजा शुक्ल हमारे समय और भाषा के महत्वपूर्ण कवि हैं। उनकी कविता में चिरंतन के साथ वर्तमान अपनी पूरी सजधज के साथ मौजूद है। केदार शोध पीठ, बांदा के सचिव कवि नरेन्द्र पुंडरीक ने बताया कि केदार जन्मशताब्दी वर्ष पर कवि व सामाजिक कार्यकर्ता शुक्लजी को नगद राशि, प्रशस्ति पत्र, स्मृति चिन्ह, शॉल श्रीफल प्रदान कर सम्मानित किया जाएगा। केदार सम्मान आयोजन समिति के सदस्य व महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के दूरस्थ शिक्षा के प्रो. संतोष भदौरिया ने बताया कि इलाहाबाद में आयोजित होनेवाले एक समारोह में अष्टभुजा शुक्ल को यह सम्मान प्रदान किया जाएगा। उन्होंने कहा कि आज के नव साम्राज्यवादी युग में जब सारी चीजों को लेकर समाज में एकरूपता लाने की कोशिश बाजार लगातार कर रहा है और ये साहित्य में भी घटित होता दिख रहा है ठीक उसी समय अष्टभुजा शुक्ल कविता की उस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं जिसके बीच नागार्जुन, त्रिलोचन और केदारनाथ अग्रवाल ने डाली। उनकी कविता में ग्रामीण भारत या भारत का आमजन प्रयासपूर्वक नहीं लाया जाता है वह अपने आप बोलता है। अमित कुमार विश्वास मा.पब्लिसिटी अधिकारी

दुनिया में ज्ञान, शांति और मैत्री की परिकल्पना को करेंगे साकार

प्रो. ए. अरविंद्राक्षन ने हिंदी विवि में संभाला प्रतिकुलपति का पदभार


वर्धा, 19 जुलाई, 2010: हिंदी के नाम पर स्थापित देश के एकमात्र महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. ए. अरविंद्राक्षन ने प्रतिकुलपति के रूप में आज पदभार ग्रहण कर लिया। पूर्व प्रतिकुलपति प्रो. नदीम हसनैन के यहाँ से लखनऊ विश्वविद्यालय जाने के उपरांत यह पद रिक्त हुआ था। प्रो.अरविंद्राक्षन ने प्रतिकुलपति का पदभार संभालने के बाद प्रेस को बताया कि मैं इस विश्वविद्यालय के स्थापनाकाल से ही जुड़ा हूँ। हिंदी विश्वविद्यालय महात्मा गांधी के दर्शन से अपनी ऊर्जा प्राप्त करता है। यह विश्वविद्यालय इस बात के लिए प्रतिबध्द है कि हिंदी को ज्ञान की सशक्त एवं क्रियाशील माध्यम के रूप में विकसित किया जाय, साथ ही यह विश्वविद्यालय अंतरानुशासनिकता को केंद्र में रखते हुए भाषा एवं मानविकी/सामाजिक विज्ञान के विषयों को नई दृष्टि से अध्ययन-अध्यापन की प्रविधि विकसित करने के लिए संकल्पित है। गांधीजी की कर्मभूमि में स्थापित यह विश्वविद्यालय ज्ञान के नए अनुशासनों यथा: स्त्री अध्ययन, अहिंसा एवं शांति अध्ययन, फिल्म एवं नाटक जैसे विषयों के माध्यम से समाज की सही पहचान करता है। इस विश्वविद्यालय के नाम मे गांधी, हिंदी और अंतरराष्ट्रीय, ये बीज शब्द जुड़े हैं इसलिए अंतरराष्ट्रीय जगत में हिंदी को ज्ञान की एक सशक्त भाषा के रूप में विकसित करने का प्रयास करेंगे। हिंदी की क्षमता अपार व विपुल है और उसका सही-सही उपयोग हुआ नहीं है इसलिए उसका उपयोग किया जाना चाहिए। चूँकि यह विश्वविद्यालय देश के अन्य पारंपरिक विश्वविद्यालयों से इतर है, हमारी यह कोशिश रहेगी कि विश्वविद्यालय की अवधारणा के मुताबिक उम्दा किस्म का अध्ययन-अध्यापन हो ताकि यह विश्वविद्यालय बौध्दिकता का एक उत्कृष्ठ केंद्र के रूप में विकसित हो सके। हम विश्वविद्यालय की परिकल्पना ज्ञान, शांति और मैत्री को दुनिया में फैलाने का भरसक प्रयास करेंगे और मुझे विश्वास है कि कुलपति विभूति नारायण जी इस विश्वविद्यालय की चहुंमुखी विकास हेतु जिस समर्पित भाव से कार्य कर रहे हैं, हम इस प्रयास पर खरे उतर सकेंगे। विश्वविद्यालयीन जगत में कई ओहदों पर दूरदृष्टि से 35 वर्षों तक कार्य कर चुके प्रो. अरविंद्राक्षन ने कहा कि हम हिंदी के माध्यम से अंतरानुशासनिक विषयों के मामले में देश के दूसरे विश्वविद्यालय व दुनिया के तमाम केंद्रों से बहुत अच्छा अंत:क्रिया स्थापित करेंगे ताकि यहां एक ऐसा अकादमिक वातावरण विकसित हो जिससे विद्यार्थी समाज, अध्यापक समाज और जनता यह जान सकें कि यह विश्वविद्यालय विमर्श के एक केंद्र के रूप में विकसित हो रहा है। और बाहर के लोग यह कह सकें कि वर्धा जाकर अनुसंधान व अंत:क्रिया करो। हमारी यह कोशिश रहेगी कि समकालीन जरूरतों को ध्यान में रखते हुए विश्वविद्यालय को 'इंटरनेशनल नॉलेज सेंटर इन हिंदी' बनाएं। इस कार्य में यहां के विद्यार्थियों, शोधार्थियों व अध्यापकों से अंत:क्रिया का सहयोग लिया जाएगा। उन्होंने बताया कि इस विश्वविद्यालय में पारंपरिक पाठयक्रमों से इतर मानविकी, समाजविज्ञान, प्रौद्योगिकी, प्रबंधन आदि की पढ़ाई व अनुसंधान कार्य हिंदी माध्यम से कराया जाना बहुत आकर्षित करता है। विदेशी भाषा फ्रेंच, चीनी, स्पेनिश भी हिन्दी माध्यम से पढ़ाई जा रही है, इससे हिंदी 'ग्लोबल' होगी। अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय गांधी जिले में होने के संबंध में उन्होंने कहा कि जिस प्रकार गांधीजी का नाम देश-दुनिया में है, उसी प्रकार हिंदी विश्वविद्यालय की ख्याति अंतरराष्ट्रीय जगत में फैलेगी। इसके लिए हमें विदेश में बसे हिंदी से संबध्द अध्यापकों व अनुसंधानकर्ताओं के लिए भी योजना बनानी होगी। यहां के छात्र, शोधार्थी, अनुसंधानकर्ता, अध्यापक भारत से बाहर जाकर अनुसंधान कार्य करें ताकि विदेशी भाषा और हिंदी भाषा में आदान-प्रदान हो सके और विश्वविद्यालय की अवधारणा के मुताबिक सबके साथ मैत्री की दिशा में हम आगे बढ़ सकें। हिंदी, मलयालम और अंग्रेजी भाषा के जानकार कवि, आलोचक व अनुवादक के रूप ख्यातिलब्ध प्रो. अरविंद्राक्षन की 50 पुस्तकें रचना संसार में शामिल हैं। उनके हिंदी विश्वविद्यालय में प्रतिकुलपति के रूप आने से परिसर में खुशी का माहौल व्याप्त हो गया। प्रो. अरविंद्राक्षन का कुलपति विभूति नारायण राय, कुलसचिव डॉ. के.जी. खामरे, वित्ताधिकारी एम.एस. खान, कवि आलोक धन्वा, ओम प्रकाश वाल्मीकि, विशेष कर्तव्याधिकारी राकेश, नरेन्द्र सिंह, प्रो. मनोज कुमार, प्रो. आत्म प्रकाश श्रीवास्तव, प्रो. इलीना सेन, प्रो. महेंद्र पाण्डेय, प्रो. अनिल के राय, प्रो. सूरज पालीवाल, प्रो. संतोष भदौरिया, प्रो. उमाशंकर उपाध्याय, प्रो. के.के. सिंह, प्रो. रवि चतुर्वेदी, प्रो. टिशन कुमार वैष्णव, उपकुलसचिव क़ादर नवाज खान, पी सरदार सिंह, सिध्दार्थ त्रिपाठी सहित विश्वविद्यालय के शैक्षणिक, गैर-शैक्षणिक कर्मी तथा विद्यार्थियों ने अभिनंदन किया है। अमित कुमार विश्वास मा.पब्लिसिटी अधिकारी

द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी 2010
स्त्री-अध्ययन विभाग,संस्कृति विदयापीठ

स्त्री-संघर्ष के सौ सालः हासिल मुकाम एवं दिशाओं की तलाश

भूमिका
8 मार्च 2009 एक ऐतिहासिक दिन का गवाह रहा है। इस दिन उस ऐतिहासिक जुलूस को शताब्‍दी होने को आयी है जो जुलूस अमेरिका की कपास मिलों की संघर्षरत महिलाओं ने निकाला । काम के घंटों को घटाकर 8 घंटे किए जाने की जीत को इस जुलूस के रूप में निकाला था। विश्‍व के पहले समाजवादी राज्‍य एवं क्‍लारा जेटकिन के प्रयासों से इस दिन को अंतरराष्‍ट्रीय कामगार महिला दिवस के रूप में पहचान मिली। आज यह दिन हर जगह मनाया जाता है मगर इसके पीछे विद्यमान संदर्भों और वादों को कोई शायद ही याद रखता हो।

वैश्विक एवं भारतीय महिला आंदोलन का एक विशाल और समृद्ध इतिहास है जिसमें उन हजारों-लाखों आम महिलाओं का योगदान है जिन्‍होंने अपने परिवार, घर और सामाजिक जिन्‍दगी के पुनर्सृजन के लिए अपना जीवन दांव पर लगा दिया। समान वेतन, सुरक्षित गर्भनिरोध, आराम, हिंसा एवं यौन उत्‍पीडन आदि के लिए एक सशक्‍त आंदोलन भारत के किसी भी क्षेत्र में देखा जा सकता है। यह संघर्ष अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर आम महिलाओं के संघर्ष की समृद्ध परम्‍परा से प्राणशक्ति लेता है। इस परम्‍परा में 8 मार्च का संघर्ष एक मील का पत्‍थर है, जिस दिन कपडा उद्योग की कामगार महिलाओं ने कामगार के बतौर समान अधिकारों एवं स्‍त्री होने के नाते विशेष अधिकारों को पाने का संघर्ष किया। यह संघर्ष स्‍त्री-अधिकारों एवं अन्‍य शोषित समूहों के बीच के अंतर्संबंधों को रेखांकित करता है। हमें यह याद रखना चाहिए कि आज हम सभी वैश्‍वीकरण एवं बाजार-उदारीकरण के शोषक पहलुओं से संघर्ष कर रहे हैं। इस अमूल्‍य इतिहास का स्‍वीकार और स्‍त्री-आंदोलन तथा अन्‍य समानता हेतु संघर्षों के बीच बारीक रिश्‍ता वस्‍तुत: अंतर्संबंधता एवं स्‍वायत्‍ता तथा 'प्रतिरोध के क्षेत्र' के ढॉंचे की हमारी समझ; स्‍त्री के स्‍वायत्‍त/ स्‍वतन्‍त्र कर्ता न होने की हमारी समझ; तथा यह मानना कि स्त्रियों को एक क्षेत्र विरासत में मिलता है और सामाजिक रिश्‍तें भी इसी के साथ होते हैं, स्त्रियां इसी क्षेत्र में केवल प्रतिक्रिया करती है, मगर इसी ढांचे में रह कर ही ऐसा कर पाती हैं, की हमारी समझ के लिए एक बहस खडी़ करते हैं। ऐसे कुछ मिलते जुलते तर्क भारतीय संसद में स्‍त्री-आरक्षण एवं समान नागरिक संहिता की जारी बहस में स्‍पष्‍ट दिखलाई देते हैं। हम लकीर के फकीर बने रहना चाहते हैं। किस तरह का कानून हो ? क्‍या फॉर्मूला काम में लाया जाए – एक तिहाई, एक चौथाई,आधा या कुछ हिस्‍सा भी नहीं? और हर साल के बातूनी कर्मकाण्‍ड, वाद-विवाद, अखबारों के लेखों, टीवी पर चर्चाओं के बावजूद हम जहां थे वहीं के वही हैं। कोई भी आश्‍चर्य कर सकता है कि सौ सालों से हम अभी तक तैर ही रहे हैं अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच पाएं हैं। ''शब्‍द नहीं कर्म'' ही उन महिलाओं का ध्‍येय वाक्‍य था, जिन्‍होंने अमेरिका में काम के आठ घंटें निर्धारित करने तथा ब्रिटेन में मतदान के लिए संघर्ष किया।

राष्ट्र वाद, धार्मिक रूढिवादिता एवं तानाशाही दबावों ने विश्व। को हिला दिया है। इन्होंुने राजनीति और नागरिक समाज में घुसपैठ कर ली है। ये लोग शिक्षा, कानून एवं मीडिया जैसे संस्थावनों में भी घुस कर अपने लिए एक सुरक्षित खाई बना ली है ताकि लोग आसानी से उन तक न पहुंच सके।

अल्पहसंख्य क समुदायों के लोगों के खिलाफ स्पोष्टद नरसंहार एवं दलित एवं अन्यह हाशियों के समूहों पर लगातार बढते हमले (कभी-कभी राज्यो के सहयोग से भी होते है), हत्यािओं, डर के आंतक, असुरक्षा एवं घरों से बलात विस्था्पन के रूप में सामने आता है। कभी – कभी तो इनके प्रति किए जा रहे आर्थिक एवं सामाजिक बहिष्का र इनकी जिन्दमगी को दूभर बना देते हैं। अदालतें उन्हेंर न्यांय नहीं दे पा रही है।

स्त्री।-आंदोलन के समक्ष चुनौतियॉं – वैश्वीतकरण और ''विकास'' पर इसका प्रभाव
एक दशक से अधिक समय से लागू आर्थिक ''उदारीकरण'' का परिणाम राज्यस द्वारा स्वा स्य्वी , बिजली और पानी जैसी मूलभूत सेवाओं से अपने हाथ पीछे खींचने के रूप में सामने आया है। इन सेवाओं के निजी हाथों में जाने से अमीर और गरीब के बीच की खाई ज्यारदा गहरी हुई है, समाज के एक बडे तबके विशेष तौर पर स्त्रियों एवं बच्चियों की इन सेवाओं तक पहुँच लगातार कठिन होती जा रही है। स्त्रियों ने गरीबों और हाशिये के तबकों विशेषत: स्त्रियों पर बुरा असर डालने वाली आर्थिक नीतियों का विरोध किया है, साथ ही सरकार को इस बात के लिए उत्तमरदायी मानती है कि वह अपने रक्षात्माक खर्चें कम करे, ऐसी नीतियॉं बनाने की पहल करे जो सभी के लिए रोटी, कपडा, मकान, स्वावस्य्वन एवं शिक्षा उपलब्धग करा सके। हम ऐसी नीतियों का विरोध करते हैं जो पर्यावरण का संरक्षण करने में असफल है; हमे पर्यावरण के प्रति समाज के प्रति उत्तैरदायी राष्ट्री य-अंतरराष्रीान य संस्था न बनाने हैं। हम ऐसी आर्थिक व्यमवस्थार कायम करने के लिए प्रतिबद्ध हैं जो लोगों के जीविका के अधिकार को सुनिश्चित कर सके; समाज के सभी तबके के लोगों को आर्थिक गतिविधियों और नीति-निर्माण में भागीदारी का अवसर दे, साथ ही सबके बीच लाभ के समतापूर्ण वितरण को निश्चित करे। हमारे सामने कई चुनौतियाँ हैं। स्त्री -अध्यमयन कार्यकर्ता होने के नाते हमारे लिए यह काफी महत्व‍पूर्ण है कि हम विचार करें कि हमने क्यास मुकाम हासिल किए हैं, साथ ही आगे के लक्ष्यर क्या होंगे तथा भविष्यह की दिशाऍं क्याक होंगी? भारतीय स्त्री -अध्येयन संघ के संस्थातपकों के अनुसार स्त्रीा-अध्य।यन विश्वयविद्यालयी शिक्षा में एक अन्तंरानुशासनिक दृष्टिकोण है जो विद्यार्थियों को लिंग, यौनता, नस्लु, वर्ग, उम्र, क्षमता, विश्वाकस तथा अन्यव सामाजिक संस्थासनों से सम्ब न्धित सत्ताल संरचनाओं के प्रति आलोचनात्मदक रूख प्रदान करता है। आज यह बात बहुत महत्व पूर्ण है कि हम संस्थाथपकों की इस भावना को समझें और अपनी उपलब्धियों तथा अधूरे कामों की आलोचनात्ममक समीक्षा करें ताकि भविष्यक की रूपरेखा का मार्ग प्रशस्तर कर सकें। स्त्री -अध्यषयन एवं स्त्रीइ-आंदोलन का एक गहरा एवं द्वन्द्वा त्मपक रिश्ताश है। विश्वंविद्यालय के एक विभाग होने के नाते अगर हम ऊपर बताए गए महत्वीपूर्ण कार्य में कुछ सशक्तप सहयोग/भागीदारी कर सकें तो हमारा प्रयास सार्थक हो सकेगा।

संगठन एवं प्रायोजक
यह कार्यक्रम स्त्रीप-अध्यओयन विभाग, महात्माय गांधी अंतरराष्ट्री्य हिंदी विश्व विदयालय तथा भारतीय स्त्री्-अध्यरयन परिषद (मध्यर भारत क्षेत्रीय कार्यक्रम) का संयुक्ती प्रयास है। भारतीय स्त्रीय-अध्य-यन परिषद मध्य् भारत के विभिन्नं प्रांतों – मध्यरप्रदेश, छत्तीासगढ, झारखंड, उत्त‍री ओडीसा तथा विदर्भ के शोधार्थियों/कार्यकर्ताओं की भागीदारी में मदद करेगा।

सहभागिता
विश्वनविद्यालय के अतिरिक्त् बाहर के 50 प्रतिभागियों को आमंत्रित किया जाएगा। विश्वगविद्यालय के भी अनुमानत: 50 प्रतिभागी होंगे। प्रतिभागियों की कुल अनुमानित संख्याआ 100 होगी।

कार्यक्रम रूपरेखा

हिंदी विवि में 'कथा समय' में 'हिंदी साहित्य के दो दशकों की यात्रा' पर हुआ गंभीर विमर्श



पूरे विश्व परिदृश्य में जो परिवर्तन हुए हैं, उनकी छाया कथा साहित्य में भी देखने को मिलती है। इस व्यापक वैश्विक परिवर्तन को रेखांकित करने तथा हिंदी कथा साहित्य में आए परिवर्तनों की पड़ताल करने के लिए महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी 'कथा समय' का आयोजन विश्वविद्यालय के साहित्य विद्यापीठ की ओर से किया गया। 'कथा समय' के प्रथम अकादमिक सत्र में 'हिंदी कहानी के दो दशकों की यात्रा' द्वितीय सत्र में 'हिंदी के उपन्यास के दो दशकों की यात्रा', तृतीय सत्र में 'हिंदी कथा आलोचना के दो दशकों की यात्रा' पर हिंदी साहित्य के तीन पीढ़ियों के उपन्यासकार, कथाकार व आलोचकों ने विचार-विमर्श किया। 'कथा समय' के उद्धाटन समारोह में बीज वक्तव्य देते हुए सुप्रसिध्द कथाकार और नाटककार असगर वज़ाहत ने कहा कि आज अभिव्यक्ति के माध्यम के लिए अखबारों में स्थान नहीं मिल रहा है, टीवी चैनलों में भी नहीं है, राजनीति में भी जगह नहीं मिल रही है। आज भी अभिव्यक्ति का आधार कथा साहित्य है। विचार को किनारे रखनेवाली कहानी रचनाएं आ रही हैं जबकि नई रचनाओं से आंदोलन को जो ऊर्जा मिलनी चाहिए थी वह नहीं प्राप्त हो रही है। उन्होंने कहा कि कोई भी रचना विचारविहीन नहीं हो सकती है। विचार का आग्रह कम माना जा रहा है। ये आग्रह इसलिए नहीं हुआ है कि लेखक ने विचार करना छोड़ दिया है। आज हम चीजों को और भी गहराई से देख रहे हैं। हमें यह सोचना पड़ेगा कि क्या हम नई पीढी के उपर दबाव बनाने में कोई गलती तो नहीं कर रहे हैं। यह भी सही है कि आज दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, प्रवासी साहित्य पर खूब रचनाएं हो रही हैं।

उद्धाटन भाषण देते हुए से. रा. यात्री ने कहा कि रचनाकार अपने कथ्य के साथ अपने शिल्प में भी एक विशेष किस्म का अलगाव अथवा भिन्नता प्रदर्शित करते हैं। कथ्य के साथ कथन का स्वरूप भी रचनाकार के व्यक्तित्व को रेखांकित करते है। संचार प्रौद्योगिकी के माध्यम से दुनिया छोटी हुई है तथा हिंदी भाषा का प्रचा-प्रसार भी बहुत तीव्र गति से हुआ है। आज जो परिवर्तन हो रहा है इसमें हमें वैचारिक व संवेदना की गहराई को तलाशने की जरूरत है। अध्यक्षीय उदबोधन में कुलपति विभूति नारायण राय ने कहा कि समाज का आईना साहित्य का आंदोलन विहीन होना चिंतनीय है। स्वतंत्रता प्राप्ति के दौरान पूरा साहित्य आंदोलनों के झंझावातों से जूझ रहा था। लेकिन आज हम कैसे विमुख हो रहे हैं, इसपर हमें सोचना होगा। यह सही है जो हाशिए पर थे, वे केन्द्र में आ गए हैं। पहले हम मानते थे कि दलित विमर्श मराठी भाषा में ही दर्ज करा रहे हैं, जबकि आज इसकी छाप हिंदी में भी देखने को मिल रही है और इसका श्रेय 'हंस' को जाता है। इतना ही नहीं रवीन्द्र कालिया नई पीढ़ी को तैयार करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। विषय प्रवर्तन करते हुए साहित्य विद्यापीठ के अधिष्ठाता प्रो. सूरज पालीवाल ने कहा कि हिंदी का कथ्य और उसके लोक दर्शन की परिकल्पना केवल इसलिए नहीं की गई है कि केवल कहानियों पर चर्चा की जाए, बल्कि इतिहास के जिस मोड़ पर हम खड़े है वह कितना खतरनाक स्थिति में है इसी बात को सारगर्भित करने के लिए 'कथा समय' का आयोजन किया गया है।

'हिंदी कथा साहित्य के दो दशक' विषय पर आयोजित सत्र की अध्यक्षता करते हुए साहित्यकार प्रो. गंगा प्रसाद विमल ने कहा कि पिछले दो दशक पिछली शताब्दी के अंतिम दशक के निष्कर्ष और नये शताब्दी के प्रवेश दशक के निष्कर्ष का युग्म है। नई पीढियों से सर्जनात्मक लेखन की बहुत उम्मीद है जो भविष्य में कहानी की अस्मिता को बचाए रखने में मददगार होगी। रचना में भाषिक सामर्थ्यवान नये लोग भी संभव कर रहे हैं। हिंदी की जो सृजनशक्ति है, उसे कमतर आंकना उचित नहीं है। उन्होंने तेजेन्द्र शर्मा के उद्बोधन को उकेरते हुए कहा कि पश्चिम में, जो भारतीय मंदिरों में जाकर यहां की अस्मिता को बचाए रखें हैं यहां यह कहना समीचिन होगा कि पश्चिम में जो भारतीय हैं वह कैसा भारतीय है? अगर उनकी अस्मिता मंदिर में जाने से तय होती है, तो यह खतरनाक है। भारतीय होकर जीना अनिवार्य होगा।

कथाकार संजीव ने साहित्य को जीवित बचाए रखने के लिए आलोचनात्मक दृष्टिकोण जरूरी है, पर बहस छेड़ते हुए कहा कि इसके लिए हमें आत्ममुग्धता से बाहर आना पड़ेगा। बहुत सारे साहित्यकार जीने की शर्तों पर बोलते हैं। कहानी केवल भाषा और शिल्प से ही नहीं बनती है अपितु उसमें जीवन का होना भी अनिवार्य है। कथाकार वंदना राग ने युवा कथाकारों द्वारा आंदोलन से दूर हटने की बात को खारीज़ करते हुए कहा कि यह पीढी मध्यवर्ग से आयी हुई है, यह सही कि पिछले 20 वर्षों में बड़े आंदोलन नहीं हुए हैं। पहले की पीढ़ी के समय बड़े आंदोलन हुए थे। आंदोलनों के अनुभवों को साहित्यिक वातावरण में उकेरा गया था। आज की पीढ़ी के समक्ष बाजारवाद का वातावरण है। चूहां दौड़ समाज में होड़ बढ़ रही है। भूमंडलीकरण के निहितार्थ आज की रचनाओं में परिलक्षित हो रही है। डॉ. महुआ माजी ने कहा कि वैश्वीकरण के कारण भारत की अपनी अर्थव्यवस्था डावांडोल हो गई है। इससे भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिवेश में भी काफी उतार-चढाव नजर आने लगा है, इसका असर यह हुआ कि नब्वे के आरंभिक वर्षों में हिंदी कथा साहित्य में इन बदलावों को बढ़-चढ़ कर रेखांकित किया जाने लगा। गरीबी, शोषण्ा अत्याचार, धर्म के नाम पर पाखंड, राजनीतिक उग्रवाद, पारिवारिक विघटन आदि की ओर तो कथाकारों का ध्यान गया ही, स्त्रियों, आदिवासियों, पिछडों, अल्पसंख्यकों या दलितों के प्रति भी साहित्य कुछ ज्यादा सचेत हुआ। तेजेन्द्र शर्मा ने सवाल उठाया कि भारत के बाहर रचे जा रहे साहित्य को प्रवासी साहित्य का नाम दिया गया है, आखिर क्यों? वीरेन्द्र मोहन ने कहा कि समकालीन हिंदी कहानी जीवन की समग्रता में कह पाने में सक्षम है। भारतीय समाज के सत्तर प्रतिशत की पीड़ाओं, विसंगतियों को सामने नहीं ला रहे हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि समकालीन हिंदी कहानी संभावनाएं जगा रही है, परंतु आज की कहानी सत्तर प्रतिशत का भी हिस्सा बनें।

'हिंदी उपन्यास के दो दशक' विषय पर आयोजित सत्र की अध्यक्षता करते हुए साहित्यकार भगवान दास मोरवाल ने कहा कि नई पीढ़ी लेखन को कैरियर के रूप में ले रही हैं। अब लेखन मैराथन दौड़ की तरह है जो इस प्रतिस्पर्धा में बने रहना चाहते हैं उन्हें धैर्य बनाए रखना होगा। आज के दौर में कथा लेखन मिशन के तौर पर नहीं बल्कि व्यावसायिकता को ध्यान में रखकर किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि रेणु नहीं होते तो हिंदी साहित्य में गांव की पृष्ठभूमि जिस तरीके से उभरी वैसा शायद संभव नहीं होता और साहित्य का परिदृश्य कुछ और ही होता। आज साहित्य को जीवन से जुड़कर देखने की आवश्यकता है।

वीरेन्द्र यादव ने कहा कि विगत कुछ वर्षों में साम्प्रदायिक शक्तियों का तेजी से उभार हुआ है। नेहरू के धर्मनिरपेक्ष मॉडल में दरार पड़ गयी है, परिणामत: बाबरी मस्जिद विध्वंस से लेकर गुजरात दंगों तक की स्थिति झेलनी पड़ रही है किंतु इसी के समानांतर मंडल के बाद सामाजिक परिवर्तन की अवस्थिति बहुत स्पष्टता से उभरी है। हाशिए के लोग केन्द्र में आ गये हैं। नवीन चन्द्र लोहानी ने पिछले दो दशकों की उपन्यास यात्रा को एक मिथकीय आत्मकथाओं का दौर मानते हुए बताया कि इस काल के दौरान अंतरविधात्मक परिवर्तन हुये। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि शोषण, शोषित और शोषक सबकुछ महिलाएं ही है फिर भी इनपर क्यों नहीं लिखा जा रहा है। महिला साहित्यकारों के प्रति उन्होंने अपनी नाराजगी व्यक्त की। विमर्श चर्चा में सहभागिता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने कहा कि हिंदी साहित्य में पूर्णकालिक उपन्यासकारों की कमी हैं। उनका यह भी मत था कि उपन्यास एक स्वतंत्र एवं केन्द्रीय विधा से बाहर क्यों हो गयी है। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद कुछेक उपन्यासों को छोड़कर लगभग वैसा कोई उपन्यास नहीं लिखा गया जो साम्प्रदायिक घटनाआें को चरितार्थ करता हो। दलित साहित्य के उपन्यासों पर विमर्श करते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि मराठी की तुलना हिंदी का उपन्यासजगत कम क्यों दिखाई देता है? उन्होंने इस पर ध्यान देने की आवश्यकता जताई।

'हिंदी कथा आलोचना के दो दशक' विषय पर आयोजित सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. असग़र वजाहत ने कहा कि आलोचना रचना, समय और पाठक के बीच में रहती है, एक-दूसरे से पारस्परिक रिश्ता बनाती है पर आज ये काम हमारी आलोचना नहीं कर रही है। आलोचना का उद्देश्य रचना की श्रेष्ठता व पूर्णत: को स्थापित करना तथा पाठक व रचना के बीच पुल बनाना है। बहुत से रचनाकार हैं जिनके उपर आलोचकों ने कम लिखा है पर उनका महत्व समय के साथ बढ़ रहा है, पाठक उसको पढ़ रहे हैं जैसे फणीश्वर नाथ रेणु, रघुवीर सहाय, राही मासूम रज़ा। लेखक अंतत: अपनी रचना के बदौलत जाने जाते हैं। उन्होंने आलोचना पर विमर्श छेड़ते हुए कहा कि आजादी के बाद जो भी आलोचनाएं लिखी गई हैं वह विश्वविद्यालयों की चपेट में आ गई हैं। विश्वविद्यालय तंत्र ने आज तक किसी बड़े आलोचक को नहीं दिया। अत: आलोचना के लक्ष्य को सीमित कर दिया गया। उन्होंने कहा कि लेखक रचना पर प्रतिक्रिया तो चाहता है किंतु ईमानदार प्रतिक्रिया चाहता है और यह केवल पाठक ही कर सकता है।

विश्वविद्यालय के साहित्य विद्यापीठ के अधिष्ठाता प्रो. सूरज पालीवाल ने बतौर वक्ता के रूप में कहा कि रचना यदि सम्पूर्ण नहीं है तो आलोचना भी सम्पूर्ण नहीं हो सकती। नई पीढ़ी के रचनाकारों में निरंतरता का अभाव देखा जा रहा है, का उल्लेख करते हुए कहा कि केवल भाषा व शिल्प से ही कोई रचना बड़ी नहीं होती अपितु सामाजिक सरोकारों से रचना बड़ी बनती है। बड़ी रचनाएं निरंतर मूल्यांकन की मांग करती है। विश्वविद्यालय के विशेष कर्तव्याधिकारी राकेश ने विमर्श में हस्तक्षेप करते हुए कहा कि उपन्यास भी अपने-आप में औद्योगिकीकरण का एक उत्पाद है। औद्योगिकीकरण ने नए प्रकार के समाज को जन्म दिया है। कहानी किसी आकस्मिक कारणों नहीं बल्कि समाज के सरोकारों से बदल रही है। हिंदी के लेखकों को दोहरी भूमिका अदा करनी पड़ती है। उन्होंने कहा कि वे कथाकार ही बड़ी रचना दे पाए जिनके सरोकार गावों से रहे है। आज की युवा पीढी में यथार्थ को पकड़ने की छटपटाहट है। अहिंसा एवं शांति अध्ययन विभाग के सहायक प्रोफेसर राकेश मिश्र ने रचना और आलोचना में द्वैध का संबंध होता है का उल्लेख करते हुए कहा कि आज ज्यादातर आलोचनाएं पसंद से लिखी जा रही हैं। साहित्यकार वंदना राग ने कहा कि आलोचना साहित्य की सबसे सम्माननीय और वस्तुपरक विधा है। आज आलोचना वस्तुपरक न होकर व्यक्तिपरक हो गई है। आलोचकों को सारे दबाव से मुक्त होकर रचना को सामने रखना चाहिए। साहित्यकार महेंद्र ने आलोचना पर बहस छेड़ते हुए कहा कि युवा साहित्यकारों को अपने चश्में से आलोचना को देखने की जरूरत है। इस अवसर पर एस. आर. हरनोट ने सवाल उठाते हुए कहा कि विकास के नाम पर आज जो पर्यावरणीय क्षति हो रही है इसपर साहित्यकारों का ध्यान क्यों नहीं जाता?

'कथा समय' के समापन सत्र में बतौर मुख्य वक्ता के रूप में साहित्यकार अब्दुल बिस्मिल्लाह ने कहा कि ये बात सामने आ रही है कि आज के लेखक आंदोलन से मुक्त हो गए हैं। सारे आंदोलन विचार की उपज से हुए हैं। आंदोलन से मुक्त होने का अर्थ है विचारों से मुक्त होना। विचार आंदोलित करता है, तहलका मचाता है। रचना में आंदोलन खत्म हो गए, लेखक संगठन निष्क्रिय हो गया है। एक दौर था जब रचनाकार की खिंचाई होती थी आज तारीफ हो रही है। पत्रों के माध्यम में टिप्पणियाँ आती थी पर आज वाह-वाह का जमाना है। ऐसे में साहित्यकारों को आत्मविश्लेषण व आत्मावलोचन करने की जरूरत है कि वे अपनी रचना में कैसे विचारों को प्रस्तुत कर रहे हैं? उन्होंने कहा कि नज़ीब मसूद की अरबी उपन्यास को नोबेल पुरस्कार मिलने पर अरब में प्रतिबंधित कर दिया क्योंकि इसमें विचार था। उन्होंने बरमबाश्त का उल्लेख करते हुए कहा कि जीसस क्राइस्ट के जमाने की बात है कि उन्हें जिस जेल में रखा गया था उसमें एक खूंखार अपराधी बरमबाश्त भी रहता था। चर्च के पादरी को इन दोनों में से जेल से किसी एक को मुक्त करना था। पादरी ने बरमबाश्त को मुक्त करने की घोषणा की, क्योंकि उनका मानना था कि बरमबाश्त तो धन का लुटेरा है पर क्राइस्ट विचारों का लुटेरा है। इसलिए ये तंत्र के लिए ज्यादा खतरनाक है। साहित्यकार

बिस्मिल्लाह ने प्रेमचंद के हवाले से कहा कि राजनीति पीछे चलती है रचना आगे चलती है आज राजनीति आगे चलती है रचना पीछे चलती है। समकालीन समय में दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, अल्पसंख्यक विमर्श, आदिवासी विमर्श पर साहित्य रची जा रही है। कबीर को किसी ने जुलाहा जाति के नाम पर कवि की संज्ञा नहीं दी गई बल्कि संत कवि कहा गया। इसी तरह से तुलसीदास सवर्ण कवि के रूप में नहीं अपितु राम कवि के नाम से जाने गए। आज साहित्य का विभाजन जाति, धर्म, वर्ग, वर्ण के आधार पर हो रहा है। साहित्य की गुणवत्ता को महत्व नहीं दिया जा रहा है, इसपर हमें सोचने की जरूरत है।

समापन समारोह की अध्यक्षता करते हुए कुलपति विभूति नारायण राय ने कहा कि प्रेमचंद ने वर्णव्यवस्था, सूदखोरी, शोषणकारी महाजनी सभ्यता जैसी समस्याओं पर लिखा, ये समस्याएं आज भी विद्यमान हैं। इन समस्याओं पर आज साहित्यकारों को ध्यान देने की आवश्यकता है। गांधी हिल पर कथा पाठ का आयोजन : महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में कथा समय के आयोजन में उद्धाटन समारोह के पश्चात गांधी हिल पर कथा पाठ का आयोजन किया गया। इस कहानी पाठ में देश-विदेश से आए कथाकारों ने कहानी पाठ किया। लंदन के प्रसिध्द प्रवासी लेखक तेजेन्द्र शर्मा ने 'कब्र का मुनाफ़ा' महुआ माजी ने 'चन्द्र बिंदु' तथा देवभूमि शिमला से आए एस. आर. हरनौट ने 'नदी गायब है' तथा जाने माने लेखक अमरीक सिंह दीप ने 'प्रलय' कहानी का पाठ किया। तेजेन्द्र शर्मा की कहानी 'कब्र का मुनाफ़ा' में उदारीकरण के बाद की अर्थव्यवस्था ने किस प्रकार से भारतीय समाज को प्रभावित किया है, यह बात परिलक्षित होती है। आदमी मुनाफ़ा और पैसा कमाने की होड़ में मानवीयता को भूल चुका है। 'समकालीन प्रेम' विषय पर चर्चा करते हुए महुआ माजी ने 'चंद्रबिंदु' कहानी में नारी सौंदर्य की विकृत स्थिति का जिक्र किया। उन्होंने इस कहानी के माध्यम से उदारीकरण के दौर की क्रूर सच्चाई का संदर्भ लेते हुए टूटते हुए वैवाहिक संबंध, असंतोष एवं वैचारिकता के पूर्वाग्रह को उपस्थितों के सामने रखा। एस. आर. हरनौट ने 'नदी गायब है' कहानी का पाठ करते हुए पहाड़ों मेें पर्यावरण की क्षति की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट किया। उनकी कहानी कही-न-कही आतंकवाद के समानांतर में पर्यावरण की चुनौतियां, ग्रामीण अंधविश्वास की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट करती है। 'प्रलय कहानी का पाठ करते हुए अमरीक सिंह ने देश की ज्वलंत समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहा। उनकी कहानी में साम्प्रदायिकता का मुद्दा प्रमुखता से उभरा। कार्यक्रम की अध्यक्षता हंस के कार्यकारी संपादक कहानीकार तथा उपन्यासकार संजीव ने की।

सामाजिक सौहार्द का संदेशवाहक नाटक 'जिस लाहौर नईं देख्या...' का मंचन : महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में सुप्रसिध्द नाटककार असग़र वज़ाहत द्वारा लिखित नाटक 'जिस लाहौर नई देख्या ओ जन्म्या नई' का मंचन श्रीराम कला केन्द्र, नई दिल्ली के कलाकारों द्वारा किया गया।

स्वतंत्रता आंदोलन के बाद देश विभाजन की त्रासदी पर आधारित इस नाटक ने अपनी प्रस्तुति से समां बांधा। दरअसल यह नाटक लखनऊ से एक मुस्लिम परिवार के लाहौर जाने के उपरांत सरकारी तंत्रों की बेरूखी और हिंदू विधवा महिला के घर में एकसाथ रहने की विवशता को बयां करता है। विधवा महिला अपनी पुस्तैनी विरासत को छोड़ने को तैयार नहीं होती। अपने घर में लखनऊ से आए मेहमानों को पनाह दी है। पाकिस्तानी तंत्र हिंदू महिला को भारत विदा करना चाहते है किंतु वह महिला भारत जाने के लिए तैयार नहीं होती। महिला को घर से निकालने के लिए स्थानीय गुंडों से मिलकर योजना बनाई जाती है किंतु पारिवारिक मेल-मिलाप के कारण दोनों परिवारों के बीच एक मानवीय संबंध विकसित होता है। दोनों परिवार एक-दूसरे के सुख शांति में अपने मज़हब को भुलाकर सहभागिता निभाते है। दीपावली का त्यौहार साथ-साथ मनाते है। वय का शिकार होकर हिंदू वृध्दा की मौत होती है और उसके दाह संस्कार से संबंधित क्रिया-कलापों को लेकर मुस्लिम समाज के दो पक्षों द्वारा घात-प्रतिघात की स्थिति बनती है और उदारवादी मौलवी अंतत: विद्रूपता का शिकार हो जाता है और स्थानीय गुंडों द्वारा उसका वध किया जाता है, क्योंकि मौलवी ने वृध्दा के दाह संस्कार के लिए हिंदू रीति-रिवाजों से अनुमति दे दी थी।

इस नाटक के निर्देशन की भूमिका राजेन्द्र नाथ ने निभाई। नाटक से जुड़े कलाकार समीप सिंह ने बताया कि इस नाटक का मंचन भूवनेश्वर, दिल्ली तथा बरेली जैसे शहरों में किया जा चुका है और वर्धा में इस नाटक का यह दसवां प्रयोग था। कलाकार के रूप में सोनी रोंझिया, मोनिका गुप्ता, सुनयना शुक्ला, दिलीप गुप्ता, शोभा शर्मा, जगदीश प्रसाद केसरी, जतिन सरना, अमित कुमार श्रीवास्तव, एस. एम. शरिफ, भूपेश जोशी, अतुल जस्सी तथा श्रीकांत वर्मा ने अभिनय कर उपस्थितों को रोमांचित किया। इस अवसर पर कुलपति विभूति नारायण राय ने अजित राय द्वारा लिखित पुस्तक का लोकार्पण किया। कथा समय समारोह के दौरान विश्वविद्यालय के साहित्य विद्यापीठ के शोद्यार्थी ज्योतिष पायेंग की चित्र प्रदर्शनी भी लगायी गई। समारोह में देश-विदेश आए साहित्यकार, विवि के शैक्षणिक, गैर-शैक्षणिक कर्मी, शोधार्थी, विद्यार्थी उपस्थित थे।

प्रस्तुति : अमित कुमार विश्वास पीएच.डी. शोधार्थी (जनसंचार विभाग)
हिंदी का लोक वैविध्यपूर्ण व रचनात्मकता से है भरा
कुलपति राय


हिंदी विश्वविद्यालय में 'हिंदी का लोक' पर त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में कुलपति विभूति नारायण राय का वक्तव्य महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में 'हिंदी का लोक' पर त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई। संगोष्ठी में 'लोक भाषा और मानक भाषा का अंतर्संबंध एवं अंतर्द्वद्व', 'लोक का साहित्य और साहित्य का लोक', 'प्रदर्शनकारी लोककलाएं और आज का समय', 'लोक की प्रतिरोधी चेतना और आज का समय' विषय पर आयोजित सत्र में देशभर से आए हिंदी लोक चिंतकों ने विचार विमर्श किया। उद्धाटन वक्तव्य में विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने कहा कि भोजपुरी, अवधी, मैथिली, ब्रज आदि बोलियों से हिंदी समृध्द होती है। इन बोलियों से हिंदी ऊर्जा प्राप्त करती है, साथ ही ये बोलियां हिंदी के लिए खाद की तरह काम करती है। हिंदी का लोक बहुत ही वैविध्यपूर्ण व रचनात्मकता से भरापूरा संसार है। हिंदी का लोक से प्रतिरोध की चेतना प्रदर्शित होती है जो कि शोषण के खिलाफ़ खड़ा दिखाई पड़ता है। उन्होंने कहा कि लोक कला के बोल कुछ ही दूरी पर बदल जाते हैं पर उनका कथ्य प्रतिरोध की चेतना को साकार करती दिखाई पड़ती है। कबीर की रचनाओं की मूल चेतना वर्णव्यवस्था के खिलाफ तथा कर्मकांडों के खिलाफ़ खड़ी दिखती है। आज हिंदी को खंडित करने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए क्योंकि हिंदी में लोकतांत्रिक चेतना निहित है। हमें हिंदी के पक्ष में खड़ा होने की जरूरत है, हम अवधी, छत्तीसगढ़ी का विरोध नहीं करते, ये तो हिंदी के लिये खाद की तरह काम करती है।

प्रमुख वक्ता के रूप में मध्यप्रदेश कला अकादमी के कपील तिवारी ने कहा कि हिंदी के साथ 35 जनपदीय भाषाएं सहयात्रा कर रही हैं, यही हिंदी की संस्कृति है। आज भी हम वैचारिकता के लिये पश्चिम की दृष्टि से देखते हैं, यह कहां तक उचित है? हिंदी के लिए 35 जनपदीय भाषाओं का शब्द संकलन करें तो हिंदी विश्व की समृध्दत्म भाषा होगी। जनपदीय भाषाओं की शब्दों को समाहित करने से हिंदी में पचास लाख शब्दों की भाषा होगी। आज देश को धर्म, भाषा, जाति के नाम पर तोड़ने की कोशिश की जा रही है। भाषा का प्रश्न संस्कृति का भी होता है, का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि भारत में दो तरह के लोग हैं, एक तो परंपरा को नहीं जानते पर वे परंपरा के आलोचक हैं तथा दूसरे वे जो परंपरा को नहीं जानते पर अपनी परंपरा पर घमंड करते हैं। भारतीय प्रभुवर्ग को तय करना पड़ेगा कि उनकी परंपराएं क्या है? आदिवासी जंगलों में वर्षों से प्रेमपूर्वक रह रहे थे पर आज हम पृथ्वी को जंगलों से खाली करने पर तुले हैं। सामूहिकता में रहने की बजाय हम व्यक्तिनिष्ठ होते जा रहे हैं।

कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. अमरनाथ ने कहा कि इतने वर्षों के बाद भी हिंदी भाषा ज्ञान की भाषा नहीं बन पायी। स्वयं गद्य का विकास नहीं हुआ है तो मेडिकल, इंजीनियरिंग की पढ़ाई की बात सोचना कहां तक जायज है। हमें सोचना पड़ेगा कि साम्राज्यवादी और भूमंडलीकरण की ताकतों के साथ अंग्रेजी हमारे समक्ष किस कदर हावी है। आज हिंदी भाषा व लोक पर खतरा मंडरा रहा है। हिंदी का लोक की प्रस्तावना रखते हुए विशेष कर्तव्याधिकारी राकेश ने कहा कि आज भारत के विकास के मॉडल पर चर्चा हो रही है, साथ में यह भी कहा जा रहा है कि औद्योगिकीकरण के साथ महाकाव्यात्मकता समाप्त हुई है। आज गांव भी शहर की नकल कर रहा है लोक कलाएं भी बदल रही हैं। लोक कलाकारों के ऊर्जा की अनदेखी हो रही है। गांधी के नाम पर स्थापित इस विश्वविद्यालय में 'हिंदी का लोक' पर आयोजित त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में विद्वानों के बीच हिंदी के विस्तृत लोक कला व परंपरा पर चिंतन मनन किया जाएगा।

'लोक भाषा और मानक भाषा का अंतर्संबंध एवं अंतर्द्वद्व' विषय पर आयोजित सत्र में विश्व भोजपुरी सम्मेलन के अंतरराष्ट्रीय महासचिव अरुणेश नीरन ने प्रमुख वक्ता के रूप में कहा कि आज हम 'हिंदी का लोक' पर विमर्श कर रहे हैं, जबकि हिंदी का कोई क्षेत्र ही नहीं है। अगर हम भारतीय हैं तो हमारा गौरव व पहचान का माध्यम हिंदी ही है। हम भाषाई एकत्मकता की बात करते हैं, हिंदुस्तान के सौन्दर्य का कारण भाषाई बहुरंगीपन भी है। हिंदी जन-जन की भाषा है। भाषा कभी भी दास नहीं हो सकती है। जनभाषा सरकार की भाषा नहीं हो सकती है। सरकार भाषा के खिलाफ बोलती है। भाषा की विविधता को राजनीतिक शक्तियाँ तोड़ना चाहती हैं। भाषा और बोली को अलग करके देखना कहाँ तक उचित है? हमें तो बोलियों को साथ लेकर चलने की जरूरत है।

अध्यक्षीय वक्तव्य में विश्वविद्यालय के अनुवाद विद्यापीठ के अधिष्ठाता प्रो. आत्म प्रकाश श्रीवास्तव ने कहा कि मानकीकरण किसी भाषा को क्षेत्रीयता से मुक्त करता है। यह क्षेत्रीयता सांस्कृतिक तौर पर क्षेत्र विशेष से विस्तारित होते हुए आगे बढ़ती है। मानकीकरण एक लचीली संकल्पना है। कोई भी

मानकीकरण अंतिम नहीं होता। किसी भाषा का मानकीकरण रूकता है तो वह भाषा विस्तारित नहीं हो पाती है। उन्होंने लोक भाषा, शास्त्र भाषा, साहित्य भाषा को व्याख्यायित करते हुए कहा कि लोक भाषा सामान्य जन की भाषा होती है, हरेक भाषा को विस्तारित करने के लिए शास्त्र भाषा तलाशती है तथा संवेदना और भावनाओं और भावनाओं को व्यक्त करने के लिए साहित्य भाषा की जरूरत होती है। भाषा विद्यापीठ के अधिष्ठाता प्रो. उमाशंकर उपाध्याय ने ऐतिहासिकता, जीवंतता और स्वायत्तता को मानक भाषा का लक्षण बताते हुए कहा कि भाषा और बोलियों के बीच बोधगम्यता होनी चाहिए।

प्रो. राज नारायण पाठक ने लोक भाषा और मानक भाषा के अतर्संबंधो को उल्लेखित करते हुए कहा कि मानक भाषा बड़े समाज की भाषा होती है। मानक भाषा गंगा नदी के समान है और लोक भाषाए इसकी सहायक नदियां है। मानक भाषा में लोक भाषा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। हिंदी की मानक भाषा के आधारं तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशज हैं।

'लोक का साहित्य और साहित्य का लोक' विषय पर आयोजित सत्र की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्याालय के साहित्य विद्यापीठ के अधिष्ठाता प्रो. सूरज पालीवाल ने कहा कि हिंदी में लोक साहित्य को आज हम जिस तरीके से दोयम दर्जे का मान लिये हैं उससे लोक में फैली हुई विपुल साहित्यिक संपत्ति का नुकसान हो रहा है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लोक में विद्यमान साहित्य को उठाकर उसका मूल्यांकन किया और उसे साहित्यिक श्रेणी में रखा। यदि हम लोक साहित्य को हिंदी साहित्य से अलग करते हैं तो हिंदी साहित्य का आदिकाल पूरा का पूरा खारीज हो जाता है इसलिए आवश्यक है कि लोक में स्थित साहित्य को हमें उसकी गुणवत्ता के आधार पर मूल्यांकन करना चाहिए। लोक बहुत ही समृध्द होता है इसलिए उसका साहित्य भी प्रतिरोध से भरा हुआ तथा चेतना से संपन्न होता है।

प्रमुख वक्ता के रूप में छपरा विश्वविद्यालय के डॉ. लालबाबू यादव ने कहा कि वर्तमान समाज में भी लोक साहित्य की प्रासंगिकता बनी हुई है, लोक साहित्य के विपुल भंडार की अमूल्य कृतियाँ आज भी प्रकाशन की प्रतीक्षा कर रही है। अगर वाचिक एवं पांडुलिपि रूप में बिखड़ी पड़ी सामग्रियों का संकलन किया जाय तो हिंदी साहित्य के भंडार में वृध्दि होगी। भोजपुरी के लोक कलाकार भिखारी ठाकुर भोजपुरी क्षेत्र में पुर्नजागरण के प्रतीक थे। भिखारी ठाकुर एवं महेन्दर मिसिर ने विशाल भोजपुरी क्षेत्र में लोक चेतना को जागृत किया। आज हमें लोक साहित्य को सहेजने की जरूरत आ गई है।

इस दौरान डॉ. अरुणेश नीरन ने कहा कि बिना प्रतिरोध के साहित्य का कोई अर्थ नहीं होता है और उसे यह शक्ति मिलती है लोक से। लोक के स्वभाव में प्रतिरोध है और यह उसके गीतों, कथाओं, गाथाओं, कलाओं और जीवन व्यवहारों में निहित है। इसलिए लोक साहित्य प्रतिरोध का साहित्य है और यह बताता है कि कि वह किसी को नहीं छोड़ता-स्वयं को, समाज को, संस्कृति को यहाँ तक कि ईश्वर को भी।

कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. अमरनाथ ने कहा कि इस समय हिंदी की कई बोलियाँ संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल होने की माँग कर रही है। छत्तीसगढ़ी को वहाँ की सरकार ने राजभाषा बनाने के बाद उसे आठवीं अनुसूची में शामिल करने का प्रस्ताव केन्द्र को भेजा है। भोजपुरी के लिए सांसद आदित्यनाथ, अली अनवर अंसारी के अलावा हमारी लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार, फिल्मी अभिनेता रविकिशन आदि ने मांग की है। राजस्थानी और अवधि के लिए मांग की गई है। मैथिली को वर्ष 2005 में ही आठवीं अनुसूची में शामिल किया जा चुका है, हिंदी के लिए यह स्थिति चिंता का विषय है। वास्तव में हिंदी इस देश की राजभाषा इसीलिए है कि उसके बोलनेवालों की संख्या सबसे ज्यादा लगभग 46 करोड़ है। यदि हिंदी की अन्य बोलियों को मैथिली की तरह आठवीं अनुसूची में शामिल कर दिया गया तो उक्त बोलियाँ बोलनेवाले लोग हिंदी भाषी नहीं माने जायेंगे और आनेवाली जनगणना में हिंदी भाषियों की संख्याबल की ताकत अचानक घट जाएगी और तब अंग्रेजी की वकालत करनेवालों का पक्ष अधिक मजबूत होगा। इतना ही नहीं, हिंदी साहित्य का इतिहास जिसमें अवधी के तुलसी, ब्रज के सूर, मैथिली के विद्यापति, राजस्थानी के चंदवरदाई आदि शामिल हैं, उनका क्या होगा? क्या खड़ी बोली हिंदी का साहित्य ही हिंदी का साहित्य होगा? हमें इस गभी समस्या पर विचार करना होगा और साहित्यकार और संस्कृतिकर्मी होने के कारण अपना पक्ष सुनिश्चित करना होगा।

'लोक की प्रतिरोधी चेतना और आज का समय' विषय पर आयोजित सत्र की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के संस्कृति विद्यापीठ के अधिष्ठाता प्रो. मनोज कुमार ने कहा कि भूमंडलीकरण के दौर में गरीबी, प्रदर्शन ड्राइंग रूम की शोभा की वस्तु बन गई है। कविता, कहानियां मनोरंजन से आगे नहीं बढ़ रही है। मुद्दों से भटकाने का लगातार प्रयास जारी है इसमें सरकार तो लगी ही ह,ैं हम भी लगे हैं। संचारतंत्र पूरी ताकत के साथ हममें भ्रम पैदा कर रहा है। संबंधों में कमी के कारण से ही सामुदायिक जीवन समाप्त होता जा रहा है। आज का यह संकट वैश्विक है। वैश्विक पूँजीवादी शक्तियाँ राजनीति के साये में जड़ फैला चुकी हैं। युवा वर्ग इंटरनेट की दुनियाँं में सूचनाओं में ज्ञान ढूँढ रहे हैं। वर्तमान सूचनातंत्र विश्वविद्यालय लोक की नजर में अपना औचित्य खो चुका है। लोक के प्रतिरोध में आ रहे भटकाव के बारे में हमें सोचने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि आजादी के पहले हमारी लड़ाई साम्राज्यवादियों से थी पर आज दुश्मन दिखता नहीं है, वह हमारे भीतर बैठा है। गांधी ने कहा था कि हिंदुस्तान को अंग्रेजों से नहीं अपितु आजकल की सभ्यता से कुचला जा रहा है। आज हम यह मान बैठे हैं कि हिंसा से समस्या सुलझती नहीं, अहिंसा पर विश्वास जमा नहीं। हम अहिंसा का रट लगाते रहे। समानता का गीत गाते रहे। क्रांति का आह्वान करते रहे फिर भी अशांति, असमानता और दरिद्रता बढ़ती गई। आज देश जिस गंभीर खतरे में पड़ा है वैसा खतरा पहले नहीं था। उन्होंने गांधीजी के वक्तव्यों के हवाले से कहा कि जब देश आजाद होगा तो नागरिक शक्ति और सैन्य शक्ति में संघर्ष अवश्यंभावी है। अगर नागरिक शक्ति कमजोड़ पड़ी तो सैनिक तानाशाही आएगी इसलिए नागरिक शक्ति को बढ़ाने के लिए लोक पर मंडरा रहे खतरे के बारे में हमें सोचना होगा।

हरिओम राजौरिया ने लोक पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि लोक कलाकारों की ताकत व आत्मबल गांवों में टूट रही है। लोक कला को बचाने के लिए हमें अपने स्तर पर प्रयास करने की जरूरत है न कि किसी सत्ता प्रतिष्ठानों पर निर्भर रहने की जरूरत है, क्योंकि सत्ता प्रतिष्ठानों का स्वभाव मेले और ठेले में सिमट कर रह गया है। बाजारवादी ताकत इसी ख्याल में रहती है कि कैसे लोक को बाजार में बेचा जाय? भारतीय फिल्म संस्थान, पुणे के निदेशक पंकज राग ने लोकचेतना के लिए 1857 के विद्रोह को सबसे सटीक बताते हुए कहा कि उससमय जीवनशैली के साथ ही जीवन का संघर्ष शुरू हुआ था। उन्हाेंने 1857 ई. के विद्रोह के दौरान हुए लूट का जिक्र करते हुए कहा कि लूटपाट उन्हीं लोगों की हो रही थी जिन्होंने औपनिवेशिक सत्ता से कुछ प्राप्त किया था। लोक गीतों में लूट के लिए उल्लास के भाव होते थे। आज फिर से नवउपनिवेशवादी शक्तियाँ हम पर हावी होती जा रही हैं। प्रतिरोध को समाप्त करने की पुरजोर कोशिश की जा रही है, इसपर हमें गंभीरतारपूर्वक सोचना होगा। साहित्यकार डॉ. बसंत त्रिपाठी ने कहा कि लोक के लिए आज बातचीत और विचार की जगह हस्तक्षेप की जरूरत है। यह हस्तक्षेप लोक में जाकर की जानी चाहिए।

सत्र का संचालन करते हुए डॉ. संतोष भदौरिया ने कहा कि आजादी के पाँच दशक के बाद भी हम गांव में गांधी के चरखे व खादी को नहीं पहुँचा सके। विश्वबैंक के माध्यम से बनी सड़क पर बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ गांवों में भी हमें पेप्सी कोक उपलब्ध करा रही हैं। बाजार हमें मनुष्यमात्र नहीं अपितु उपभेक्ता मानकर चलती है। आज की बाजारवादी शक्तियों के बीच में हमें मनुष्य बने रहने का भी संकट पैदा कर दिया है। वर्धा की धरती से ही 'करो या मरो' का नारा दिया गया था। उनके नाम पर स्थापित यह विश्वविद्यालय हमें मनुष्य बने रहने और दूसरो को भी मनुष्य बनने की प्रेरणा देते रहें, को संकल्पित कराती हैं। सत्र के दौरान विश्वविद्यालय के शोधार्थी कमलेश यादव, मुन्नालाल गुप्ता, शंभुनाथ मिश्र ने भी अपने विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर देशभर के हिंदी लोक के चिंतक विद्वान, विश्वविद्यालय के शैक्षणिक, गैर-शैक्षणिक कर्मी, शोधार्थी व विद्यार्थी उपस्थित थे।

प्रस्तुति : अमित कुमार विश्वास पीएच.डी. शोधार्थी (जनसंचार विभाग)
पर्यावरणीय प्रदूषण से उत्पन्न खतरों का निदान वृक्ष खेती से संभव
सुन्दरलाल बहुगुणा


हिंदी के माध्यम से ज्ञान के विविध अनुशासनों में शिक्षा एवं शोध को बढ़ावा देने के उद्देश्य से गांधीजी की कर्मभूमि, वर्धा में स्थापित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के बारहवें स्थापना दिवस समारोह में पद्म विभूषण से विभूषित पर्यावरणविद् सुन्दरलाल बहुगुणा ने बतौर मुख्य अतिथि के रूप में 'सभ्यता एवं पर्यावरण' विषय पर व्याख्यान दिया। समारोह की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने की। विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति प्रो. नदीम हसनैन, कुलसचिव डॉ. के.जी. खामरे व सहायक प्रोफेसर राकेश मिश्र मंचासीन थे।

चिपको आंदोलन से जुड़े गांधीवादी पर्यावरणविद् सुन्दर लाल बहुगुणा ने अपने ऐतिहासिक भाषण में कहा कि पश्चिम की भोगवादी सभ्यता भारतीय संस्कृति को ढ़कती जा रही है। आज भोगवादी सभ्यता ने संकट पैदा किए हैं। अनेक देश बारूद के ढ़ेर पर खड़े हो रहे हैं। युध्द के भय से सुरक्षा के नाम पर हमने देश को संकट में डाल दिया है। गरीब देश अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा हथियार खरीदने में लगा रहा है। गांधीजी ने भाईचारे का संदेश दिया था। उनका कहना था कि एबीसी (अफगानिस्तान, बर्मा, सीलोन) का त्रिकोण बनाओ, इससे सीमा सुरक्षा पर खर्च कम होगा तथा पैसे का व्यय विकास कार्यों में लगाया जा सकेगा। गांधीजी भी कहते थे कि सुरक्षा खर्च अनुत्पादक है। इस खर्च का व्यय धरती को उठाना पड़ता है, इसलिए इसपर खर्च नहीं किया जाना चाहिए। हमने त्रिकोण तो नहीं बनाया, पर यूरोपीय देशों ने व्यापारिक उद्देश्य से महासंघ बना लिया।

सुन्दरलाल बहुगुणा ने कहा कि आज धरती पर पर्यावरण, जल संकट, युध्द का भय, जनसंख्या वृध्दि, भूख तथा गरीबी बड़ी समस्याएँ हैं। इन समस्याओं से निजात पाने के लिए महात्मा गांधी का रास्ता ही एकमात्र उपाय है। गांधीजी द्वारा चलाए गए आजादी आंदोलन के प्रभाव का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उस समय पूरे देश में गांधी की ऑंधी चल रही थी, मैंने गांधी को देखा नहीं था, 13 वर्ष की अवस्था में गांधीजी के आंदोलन में शामिल हो गया। 17 वर्ष की आयु में मुझे इंटर की परीक्षा पुलिस हिरासत में देनी पड़ी। उन्होंने कहा कि गांधीजी ने भारतीय संस्कृति को पुनर्जीवित कर देश और दुनिया के सामने घनघोर अंधेरे में एक दीप का काम किया। गांधीजी के समकालीन हिटलर, स्टालिन, मुसोलिनी हुए। ये इतिहास की वस्तु हो गए केवल गांधी जीवित रह गए। गांधी मानव जाति का भविष्य है।

पर्यावरणीय समस्याओं के संदर्भ में सुन्दरलाल बहुगुणा ने कहा कि जंगलों की अंधाधुंध कटाई होने से पानी की समस्या दिनों-दिन विकराल होती जा रही है। वर्षा के पानी से धरती का लहू-माँस बहकर जा रहा है। हरित क्रांति के नाम पर हमने रासायनिक खादों से धरती माँ को नशेबाज बना दिया है। वायु व जल प्रदूषण तथा मिट्टी का क्षरण रोकने का एकमात्र उपाय वृक्ष खेती है। वृक्ष खेती से हम स्वावलंबी बन सकते हैं। हमें फूलों, फलों, रेशा वाली पौधे के लिए उपयुक्त जगह कहाँ मिलेगी?, इसपर अनुसंधान करने की जरूरत है। सभ्यता और सुरक्षा की चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि आज की भोगवादी सभ्यता में हम धरती का दोहन कर अगली पीढ़ी को अंधकार में डाल रहे हैं।

उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति की परंपरा अरण्य संस्कृति की रही है, जो मनुष्य प्रकृति के बीच में रहेगा वही प्रकृति से भी प्रेम करेगा। आज अरण्य ही क्या लोग गांवों को भी भूलने लगे हैं। गांधीजी गांवों को ताकतवर बनाना चाहते थे। उनका मानना था कि गांव समृध्द होगा तो हर हाथ को रोजगार मिलेगा। जिससे हिंदुस्तान समृध्द होगा।

सुन्दरलाल बहुगुणा ने कहा कि 82-83 वर्ष की अवस्था मे मेरी यह सामान्य यात्रा नहीं है। यह यात्रा मेरे लिए तीर्थ के समान है। कपड़े की दुकान, झगड़े की दुकान और दारू की दुकान, ये बाजार के शोषण के केंद्र में है। ये उत्पादन नहीं करते अपितु वितरण करने में ही सबसे ज्यादा मुनाफा कमाते हैं। वर्तमान समस्याओं से छटपटाहट में गांधीजी के नाम पर स्थापित विश्वविद्यालय में बहुत आशा के साथ आया हूँ कि यह विश्वविद्यालय सारे देश का नेतृत्व करेगा। गांधी विश्वविद्यालय गांधी की विरासत है। यह विश्वविद्यालय केवल डिग्रियाँ व नौकरियाँ हेतु तैयार करनेवाला ही नहीं होगा अपितु कार्र्यकत्ता तैयार करेगा, जो शासन व शोषण से मुक्ति दिलाने हेतु समाज के लिए प्रकाशस्तम्भ बन सके।

अध्यक्षीय वक्तव्य में कुलपति विभूति नारायण राय ने ग्लोबल वार्मिंग के संदर्भ में कहा कि ग्लेशियरों की बर्फ पिघल रही है, इसके कारण मानव अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है। पर्यावरण प्रदूषण की समस्या वैश्विक समस्या बन गई है। विकास के नाम पर बड़े बांध से विस्थापितों की संवेदनशीलता, पेड़ों की कटाई से धरती को बचाने की मुहिम में बहुगुणा जी भरपूर प्रयास कर रहे हैं। बहुगुणा जी ने गांधीजी के नाम पर स्थापित इस विश्वविद्यालय से जो अपेक्षाएं की हैं, हम प्रयास करेंगे कि इस दिशा में अपना अभिन्न योगदान दे सकें। इस अवसर पर प्रो. नदीम हसनैन ने स्वागत भाषण के दौरान कहा कि एक वर्ष में विश्वविद्यालय में जो विकास हुआ है, वह सब आपके सामने है। अकादमिक व ढाँचागत क्षेत्र में हम निरंतर तेजी के साथ प्रगति की ओर बढ़ रहे हैं। समारोह का संचालन राकेश मिश्र ने किया तथा विशेषर् कत्तव्याधिकारी राकेश ने आभार माना। समारोह के दौरान विश्वविद्यालय के इतिहास में पहली बार विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा आयोजित जेआरएफ एवं राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) उत्तीर्ण व राजीव गांधी फैलोशिप प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को सम्मानित किया गया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने गांधीजी के प्रिय भजन वैष्ण्वजन तो तैणे कहिए गीत प्रस्तुत किया। विवि के सहायक प्रोफेसर अनिर्बाण घोष द्वारा चीनी में अनुदित गांधीजी के प्रिय भजन को चीन से आए छात्र छांग चुआंग व छांग लिंगपो ने चीनी भाषा में प्रस्तुत किया। कार्यक्रम के दौरान कुलपति राय ने सुन्दरलाल बहुगुणा तथा विमला बहुगुणा को विश्वविद्यालय का स्मृति चिन्ह, शाल से भव्य स्वागत किया।

यादगार बनी सांस्कृतिक संध्या % बारहवें स्थापना दिवस समारोह के सुअवसर पर इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ एवं दल द्वारा प्रस्तुत पंथी लोक नृत्य गीतों की रंगारंग प्रस्तुति ने समा बांधा। ख़ास छत्तीसगढ़ी शैली में करीब 26 कलाकारों के दल ने लोकनृत्यों में पंथी, करमा, भोजली, चिटखोया, गौर, रंजाजर, भुलकी, पाटा, ठरका तथा राऊत आदि लोक नृत्य प्रस्तुत कर विश्वविद्यालय के छात्र अध्यापक तथा वर्धावासी गणमान्य अतिथियों को खूब रिझाया। इस दल ने डॉ. भरत पटेल के निर्देशन में नृत्य प्रस्तुत किए। उन्हें सहयोगी कलाकार के रूप में रिकी क्षत्रिय तथा उद्धोषक के रूप में अजय उमरे ने सहयोग दिया। कु. बाली देवदास, मोना, लता, तारणी, प्रीति साहू, राम कुमार पाटिल, वासुदेव, विष्णु, प्रकाश, संतोष आदि कलाकारों ने नृत्य प्रस्तुत कर स्थापना दिवस कार्यक्रय को और यादगार बनाया। वादक के रूप में धनी ठाकुर, डोरे लाल तथा राम कुमार ने साथ संगत की।

प्रस्तुति : अमित कुमार विश्वास पीएच.डी. शोधार्थी (जनसंचार विभाग)
हिंदी विश्वविद्यालय का दूसरा दीक्षांत समारोह
वर्धा, (09 दिसंबर, 2009) अमित कुमार विश्वास
  • हिंदी विश्वविद्यालय ने मॉरीशस के राष्ट्रपति सर अनिरुध्द जगन्नाथ को डी. लिट् की मानद उपाधि से किया विभूषित
  • द्वितीय दीक्षांत समारोह में 31 विद्यार्थियों को स्वर्ण, 42 को रजत और 30 को कांस्य पदक से नवाज़ा गया
  • विश्वविद्यालय के कुलाधिपति प्रो. नामवर सिंह ने की समारोह की अध्यक्षता
  • यूजीसी के अध्यक्ष प्रो. सुखदेव थोरात ने बतौर मुख्य अतिथि समारोह को किया संबोधित।


मानवीय मूल्यों से सरोकार रखते हुए बेहतर नागरिक का संकल्प लिए परंपरागत रेशमी गाउन पहने उत्साहित विद्यार्थियों ने देश और समाज के लिए पूर्ण मनोयोग से योगदान करने की प्रतिज्ञा की। इस शपथ के समवेत स्वर ने विशाल सभागृह के संपूर्ण वातावरण को एक विशिष्ट रोमांच से भर दिया। इसके साथ ही 09 दिसंबर, 2009 का दिन यादगार बन गया। अवसर था महात्मा गांधी की कर्मस्थली वर्धा (महाराष्ट्र) स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के दूसरे दीक्षांत समारोह का।

विश्वविद्यालय के कुलपति और हिंदी के विशिष्ट उपन्यासकार विभूति नारायण राय ने इस अवसर पर मॉरीशस के राष्ट्रपति सर अनिरुध्द जगन्नाथ को डी.-लिट्. की मानद उपाधि से विभूषित किया। इस गरिमामय दीक्षांत समारोह के दौरान मॉरीशस के राष्ट्रपति सर अनिरुध्द जगन्नाथ बतौर विशिष्ट अतिथि, यूजीसी के अध्यक्ष प्रो. सुखदेव थोरात मुख्य अतिथि के रूप में, कुलपति विभूति नारायण राय, प्रतिकुलपति प्रो. नदीम हसनैन मंचासीन थे। समारोह की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलाधिपति और हिंदी के प्रख्यात साहित्य समालोचक प्रो. नामवर सिंह ने की। समारोह के दौरान विश्वविद्यालय के विभिन्न संकायों के 31 विद्यार्थियों को स्वण्र् ा, 42 को रजत, 30 को कांस्य पदक से नवाजा गया। साथ ही, पीएच्.डी, एम.फिल., एम.ए., डिप्लोमा व सर्टिफिकेट पाठयक्रमों के 246 विद्यार्थियों को डिग्री व प्रमाण पत्र दिये गये। भाषा विद्यापीठ के पी.वी. जगमोहन को पीएच्.डी. की डिग्री प्रदान की गई।

इस अवसर पर मॉरीशस के राष्ट्रपति सर अनिरुध्द जगन्नाथ ने भोजपुरी में दिए अपने ऐतिहासिक भाषण में कहा कि मॉरीशस में रहनेवाले भारतवंशियों के खून में हिंदी रचती बसती है (इहे भाषा हमनी के जीवनी शक्ति देती आ)। उन्होंने कहा कि मॉरीशस और भारत का रिश्ता दूध-खून का है। इस रिश्ते को निरंतर मजबूत बनाने में भारत खासकर वर्धा के महात्मा गॉधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की बड़ी भूमिका है। चूँकि यह पहला अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय है इसलिए इसकी जिम्मेदारी भी बड़ी है। यह जानकर हमें खुशी हो रही है कि विश्वभर में फैले पाठकों के लिए इस विश्वविद्यालय द्वारा हिंदी साहित्य के एक लाख पृष्ठों को 'हिंदीसमयडॉटकॉम' पर डाला गया है। इसके लिए विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय धन्यवाद के पात्र हैं। उन्होंने विश्वविद्यालय में पारम्परिक पाठयक्रमों से इतर मानविकी विषयक पढ़ाई कराने पर खुशी जाहिर करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय के चारों विद्यापीठ यथा : भाषा, साहित्य, संस्कृति, अनुवाद एवं निर्वचन के तहत एम. ए., एम.फिल. और पीएच. डी. की पढ़ाई हो रही है। हम यहाँ के विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं। विश्वविद्यालय में शांति, अहिंसा जैसे पाठयक्रम चलाए जाने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि यह पाठयक्रम पूरी दुनिया को नई दिशा दे सकेगा क्योंकि आज विश्वभर में हिंसा और आतंकवाद की समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी है, ऐसे में अहिंसा अध्ययन का प्रायोजन स्वत: सिध्द होता है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि यह विश्वविद्यालय, पूरी दुनिया में हिंदी के माध्यम से शांति, अहिंसा और सद्विचार फैलाए और हिंदी की चेतना को विश्वव्यापी बनाए।

भारत और मॉरीशस के सांस्कृतिक और शैक्षणिक संबधों की चर्चा करते हुए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष प्रो.सुखदेव थोरात ने कहा कि यह विश्वविद्यालय हिंदी के लिए अपने आप में देश का एक अनूठा अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय है। उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षा के स्तर पर हम यह प्रयास कर रहे हैं कि शैक्षणिक आदान-प्रदान भारत और मॉरीशस के बीच हो।

विश्वविद्यालय के कुलाधिपति प्रो. नामवर सिंह ने उपाधि धारण करने वाले छात्रों के बीच मॉरीशस के राष्ट्रपति की उपस्थिति को सुखद और ऐतिहासिक क्षण बताया। उन्होंने कहा कि मॉरीशस के राष्ट्रपति की यह उपस्थिति सन 1975 के प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन की याद को ताजा करती है। सम्मेलन में मॉरीशस के तत्कालीन राष्ट्रपति सर शिवसागर रामगुलाम ने अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय का सपना दिखाया था, जो कि 1997 ई. में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के रूप में यहाँ फलीभूत हुआ। यह विश्वविद्यालय अपने लक्ष्यों और उद्देश्यों को प्राप्त करने हेतु अग्रसर है। दीक्षांत समारोह के बारे में उन्होंने कहा कि 'कन्वोकेशन' की यह परंपरा चर्च की है और वैदिक गुरुकुल परंपरा में इसे समावर्तन संस्कार कहा जाता है। त्रैत्रियोपनिषद का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय के प्रत्येक छात्र को सच बोलना चाहिए और अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। उन्होंने विश्वविद्यालय में मॉरीशस के राष्ट्रपति के आगमन पर आभार प्रकट करते हुए विश्वविद्यालय के उज्ज्वल भविष्य की कामना की।

विश्वविद्यालय का प्रगति-पत्र प्रस्तुत करते हुए कुलपति विभूति नारायण राय ने कहा कि विश्वविद्यालय के सभी अध्यापक, छात्र और अन्य कर्मी पूरा प्रयास कर रहे हैं कि वे हिंदी समाज की आकांक्षाओं पर खरे उतर सकें। उन्होंने कहा कि हिंदी को एक अंतरराष्ट्रीय भाषा बनाने के लिए यह भी आवश्यक है कि ज्ञान के विभिन्न अनुशासनों में पाठय-सामग्री हिंदी माध्यम से विद्यार्थियों तथा शोधार्थियों को उपलब्ध हो सके। विश्वविद्यालय ने प्रथम चरण में स्त्री अध्ययन, मानवशास्त्र तथा फ़िल्म और थियेटर की पाठय-सामग्री हिंदी में उपलब्ध कराने की प्रक्रिया प्रारम्भ कर दी है और शीघ्र ही इस प्रयास के परिणाम दिखाई देने लगेंगे। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय इस समय सामाजिक विज्ञान का एक वृहत् विश्वकोश कई खण्डाें में निर्मित कर रहा है और आशा है कि जुलाई 2010 ई. तक पहला खण्ड प्रकाशित हो जाएगा। उन्होंने कहा कि दुनियाभर में फैले हिंदी के पाठकों के लिए विश्वविद्यालय ने 'हिंदीसमयडॉटकॉम' के नाम से एक वेबसाइट प्रारंम्भ किया है। इसके तहत हिंदी में छपी सारी महत्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध होगी। इस वेबसाइट पर उपलब्ध सामग्री का दुनियाभर की महत्वपूर्ण भाषाओं में अनुवाद कराने की महत्वाकांक्षी योजना भी विश्वविद्यालय तैयार कर रहा है। उन्होंने दीक्षांत समारोह में उपाधि अर्जित करने वाले विद्यार्थियों को बधाई देते हुए स्मरण कराया कि महात्मा गांधी के आदर्शों से जुड़ी इस संस्था की उपाधि उन्हें खास तरह का दायित्व सौंप रही है, इसे प्रत्येक विद्यार्थी को निर्वहन करना चाहिए।

दीक्षांत समारोह के अवसर पर आयोजित सांस्कृतिक संध्या कार्यक्रम में लोकगायिका पद्मश्री तीजनबाई ने पंडवानी लोकगायन पारंपरिक ढंग से प्रस्तुत कर समारोह को अविस्मरणीय बना दिया। सांस्कृतिक संध्या कार्यक्रम का संचालन विश्वविद्यालय के विशेषर् कत्तव्याधिकारी राकेश ने किया। इस दौरान विश्वविद्यालय की वेबसाइट 'हिंदीसमयडॉटकॉम' का लोकार्पण राष्ट्रपति सर अनिरूध्द जगन्नाथ द्वारा किया गया। दीक्षांत समारोह की शुरूआत में शोभायात्रा ने जहां समां बांधा, वहीं विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत पूज्यबापू के प्रिय भजन 'वैष्णव जन तो तेने कहिए' से सभा यादगार बन गई। समारोह का संचालन नागपुर आकाशवाणी की श्रध्दा भारद्वाज, कमल सागरे ने किया। दीक्षांत समारोह में विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. के.जी. खामरे, भाषा विद्यापीठ के अधिष्ठाता प्रो. उमाशंकर उपाध्याय, अनुवाद एवं निर्वचन विद्यापीठ के अधिष्ठाता प्रो. आत्मप्रकाश श्रीवास्तव, संस्कृति विद्यापीठ के अधिष्ठाता प्रो. मनोज कुमार, साहित्य विद्यापीठ के अधिष्ठाता प्रो. सूरज पालीवाल भी मंचस्थ थे। इस अवसर पर श्रीमती सरोजनी जगन्नाथ, श्रीमती पद्मा राय, डॉ. विमल थोरात, डॉ. विभा गुप्ता, प्रा. अनंतराम त्रिपाठी, हेमचंद्र वैद्य, शिवदत्त मिश्र, मूलचंद बड़जाते, वसंत पाण्डेय सहित विश्वविद्यालय के विद्यापरिषद के सदस्यगण, शैक्षणिक, गैर-शैक्षणिक कर्मी, उपाधि प्राप्त करने वाले छात्र/शोधार्थी, अभिभावक व गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।

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निजी स्वार्थों से जेहाद के नाम हो रहा है खून खराबा
वर्धा, 31 अक्टूबर, 2009
जेहाद का शाब्दिक अर्थ है-प्रयत्न करना, उद्यम करना। जेहाद का सीधा सा अर्थ है उद्यमपूर्वक इस्लाम के पाँच मूल उसूलों (शाहद, नमाज, जकात, सावत्र एवं हज) के अनुसार जीवनयापन करते हुए अपने उपर क़ाबू पाना। मोहम्मद साहब भी जेहाद के बारे में कहते हैं कि मानवीयता के साथ उच्च नैतिक तथा धार्मिक सिध्दान्तों की सुरक्षा उच्च चरित्र निर्माण के लिए प्रतिबध्द होना ही जेहाद है। जेहाद रक्षाकारी होना चाहिए न कि धर्म की आड़ मे आक्रमणकारी। आज जेहाद के नाम पर धर्म का मुखौटा लगाकर खून-खराबा हो रहा है, इसे निजी स्वार्थ से ऐसे लोग इस्लाम की व्याख्या कर रहे हैं। उक्त उद्बोधन महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के प्रतिकुलपति, फुलब्राइट स्कॉलर (यू.एस.ए.) व सुप्रसिध्द मानवशास्त्री प्रो. नदीम हसनैन ने व्यक्त किए। वे विश्वविद्यालय की संस्था 'विमर्श' की ओर से विश्वविद्यालय परिसर में 'एक इस्लाम, अनेक व्याख्यायें और वर्तमान संसार : एक समाजशास्त्रीय विश्लेषण' विषय पर आयोजित विशेष व्याख्यान के दौरान बोल रहे थे। इस अवसर पर मंच पर संस्कृति विद्यापीठ के अधिष्ठाता प्रो. मनोज कुमार, विमर्श के संयोजक शरद जायसवाल उपस्थित थे।
प्रतिकुलपति प्रो. हसनैन ने कहा कि '9/11' की घटना के बाद अमरीका व यूरोप में क़ुरान की जबर्दस्त विक्री हुई। विदेशियों ने कुरान की प्रतियाँ यह जानने के लिए खरीदी कि बम कैसे बनायी जाती है? ट्रेन/जहाज कैसे हाईजैक किया जाता है? लेकिन उन सभी पाठकों को बड़ी निराशा हाथ लगी। यह सही है कि कुछ मुसलमान आतंकवादी कुकृत्य में संलिप्त हो सकते हैं और इसका खमियाजा इस्लाम धर्म को भुगतना पड़ता है। उन्होंने क़ुरान, हदीस, सुन्नत को इस्लाम धर्म का आधार स्त्रोत बताते हुए कहा कि क़ुरान एक पवित्र ग्रंथ है जो मानवीय प्रेम और भाईचारा का संदेश देता है।
प्रो. हसनैन ने इस्लाम धर्म को व्याख्यायित करते हुए कहा कि इस समय इस्लाम में तीन धाराएँ हैं-पहला, कस्टमरी-जो इस्लाम के सिध्दान्तों के साथ स्थानीय रीति-रिवाजों को मानने वाले हैं, दूसरा पुनरूत्थानवादी जो कि धर्म की कमजोरियों व अशुध्दियों को दूर करने पर जोर देता है और तीसरा उदारवादी इस्लाम जो लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ-साथ आधुनिक चेतना के विकास को सुनिश्चित करता है, साथ ही, यह धर्म आधारित राज्य के खिलाफ है। कुरान, न्यायिक समाज की व्याख्या देता है इसलिए राज्य को धर्म का सहारा लेने की जरूरत नहीं है। उन्होंने शरियत के अर्थ को समझाते हुए कहा कि शरियत का मतलब होता है रास्ता बनाना, पर आज धर्म की आड़ में लोग उत्पीड़न करते हैं तो यह खतरनाक बात है। वैश्वीकरण के संबंध में उन्होंने कहा कि वैश्वीकरण के फलस्वरूप धर्म में खुलापन और आधुनिक बोध का संचार हो रहा है। इस खुलापन और आधुनिकता का इस्तेमाल बेहतर समाज के निर्माण के लिए किया जाना चाहिए। बहुपत्नीविवाह के सन्दर्भ में उन्होंने कहा कि ऐसा माना जाता है कि मुसलमान कई पत्नियाँ रखते हैं जबकि बहुपत्नीविवाह की प्रथा भारतीय मुस्लिमों में सबसे कम है और उसका एक ऐतिहासिक परिवेश भी है।
महिलाओं के अधिकारों का जिक्र करते हुए प्रो. हसनैन ने कहा कि महिलाओं को जीवनसाथी चुनने का अधिकार, पारिवारिक सम्पति पर अधिकार सबसे पहले इस्लाम धर्म में दिया गया। उदारवादी इस्लाम कहता है कि ये सारे अधिकारों के होने के वाबजूद भी पितृसत्तात्मक समाज इसे नहीं स्वीकारती है और वे धर्म का सहारा लेती है। इस्लाम में बच्चे पैदा करने की प्रवृति पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि इस्लाम का उदय ऐसे समय में हुआ जहाँ हिंसा का वर्चस्व था, वयस्क पुरूष मारे जाते थे अतएव लिंग अनुपात को समान रखने के लिए बच्चे पैदाइशी की प्रवृति बढ़ी थी। कस्टमरी इस्लाम का मानना है कि हमारा जो खान-पान है, ईश्वर देता है, बच्चे की पैदाइशी रोकने वाले तुम कौन हो? लेकिन उदारवादी इस्लाम का मानना है कि बच्चे को अच्छा भविष्य आपको देना है इसलिए सोच समझकर बच्चे का जन्म दें ।
हिन्दी विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर व सुप्रसिध्द पत्रकार डॉ. कृपाशंकर चौबे ने कहा कि भारत के मुसलमानों को प्रमाण देना पड़ता है कि वे भी भारतीय हैं। प्रो. मनोज कुमार का मानना है कि दुसरे धर्म पर आलोचना करना साम्प्रदायिकता है। विमर्श के संयोजक शरद जायसवाल ने समारोह का संचालन किया तथा स्त्री अध्ययन की व्याख्याता अवन्तिका शुक्ला ने आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर परामर्शदाता डॉ. एस. कुमार, मानवशास्त्र विभाग के प्रो. बी. एम. मुखर्जी, डॉ. सुनील सुमन, डॉ. रामानुज अस्थाना, संदीप सपकाले, शंभु जोशी सहित विश्वविद्यालय के शैक्षणिक, गैर-शैक्षणिक कर्मी, शोधार्थी व विद्यार्थी उपस्थित थे।

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