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महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में नेट परीक्षा के लिए परीक्षा-पूर्व कोचिंग प्रारंभ
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, नई दिल्ली के सहयोग से राष्ट्रीय अर्हता परीक्षा (नेट) की तैयारी के लिए 1 अगस्त से परीक्षा-पूर्व कोचिंग प्रारंभ हुआ है। विश्वविद्यालय में देश भर से पढ़ाई के लिए आने वाले अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अल्पसंख्यक एवं ओबीसी के नॉन क्रीमी लेयर श्रेणी में आने वाले छात्र इस कोचिंग का लाभ ले सकेंगे। नेट कोचिंग में तीन प्रश्न-पत्रों पर छात्रों का मार्गदर्शन किया जाएगा। प्रश्न-पत्र -1 के अंतर्गत शिक्षण एवं शोध अभियोग्यता तथा प्रश्न-पत्र 2 एवं 3 के अंतर्गत वैकल्पिक विषयों में , बौध्द, जैन, गांधीवादी एवं शांति अध्ययन, जनसंचार एवं पत्रकारिता, तुलनात्मक साहित्य, स्त्री अध्ययन और भाषा विज्ञान की पढ़ाई होगी। नेट कोचिंग के समन्वयक तथा डॉ. बाबासाहब आम्बेडकर अनुसूचित जाति एवं जनजाति अध्ययन केन्द्र के निदेशक प्रो. एल. कारूण्यकरा ने विश्वविद्यालय के इस महत्वाकांक्षी पहल के बारे में बताया कि यू. जी. सी. द्वारा प्रायोजित इस कोचिंग के माध्यम से विश्वविद्यालय के अनुसूचित जाति, जनजाति तथा अल्पसंख्यक एवं ओबीसी के नॉन क्रीमी लेयर श्रेणी के छात्रों को यू. जी. सी. द्वारा आयोजित होने वाली राष्ट्रीय अर्हता परीक्षा (नेट) में सफलता सहज होगी। उन्होंने कहा कि कोचिंग की कक्षाएं सभी कार्य दिवसों में दोपहर 3 बजे से 6 बजे तक तथा प्रत्येक शनिवार एवं रविवार को सुबह 9.30 बजे से सायं 5.30 बजे तक विश्वविद्यालय में आयोजित की जा रही है। विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति प्रो. नदीम हसनैन ने इस केन्द्र के बारे में बताया कि इन परीक्षाओं के लिए छात्रों को पूरी तरह से तैयार करने के लिए विषय विशेषज्ञ के रूप में बाहर से अतिथि अध्यापकों को बुलाया जाएगा। उन्होंने आशा जताई कि समाज में गरीब तबके के तथा प्रतियोगिता परीक्षाओं के लिए महंगी फीस न जुटा सकने वाले छात्रों को इस कोचिंग के माध्यम से मदद मिलेगी।
गौरतलब है कि प्रतियोगिता परीक्षा में अधिक से अधिक संख्या में छात्रों को तैयार करने के लिए विश्वविद्यालय में इस प्रकार के कोचिंग की आवश्यकता थी। इस संदर्भ में कुलपति विभूति नारायण राय ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के समक्ष एक प्रस्ताव रखा था जिसे शीघ्र मंजूर कर लिया गया।
बी. एस. मिरगे (जनसंपर्क अधिकारी)
हिन्द स्वराज है एक बहस
प्रो. नामवर सिंह का वक्तव्य
हिन्द स्वराज में जो बहस है, वह समाज में व्याप्त शोषण व हिंसा के प्रति है। गांधीजी ने अहिंसा का बहस देकर समाज को एक नयी दिशा प्रदान की। गांधीजी मशीन व टेक्नोलॉजी के विरोधी थे क्योंकि इन दोनों में हिंसा है। हिंसा सिर्फ तोप व बंदूक से ही नहीं होती है। मशीन व टेक्नोलॉजी में मजदूरों का खून-पसीना बहता है, यह भी एक हिंसा है। इसमें तो मैनपावर से होर्सपावर की तरह काम लिया जाता है। आज भूंमडलीकरण के दौर में जहां कि शोषणकारी हमारे घर में घुस चुका है। ऐसे में इस पुस्तक की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है। इस पुस्तक को बार-बार पढ़ने की जरूरत आ पड़ी है।
 'हिन्द स्वराज और आज का भारत' विषय पर व्याख्यान समारोह के दौरान मंच पर प्रो. नामवर सिंह, कुलपति विभूति नारायण राय, प्रो. सूरज पालीवाल व उपस्थित गणमान्य लोग।
उक्त विचार महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के कुलाधिपति प्रख्यात साहित्य आलोचक प्रो. नामवर सिंह ने व्यक्त किए। वे विश्वविद्यालय द्वारा स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर अनुवाद एंव निर्वचन विद्यापीठ भवन में 'हिन्द स्वराज और आज का भारत' विषय पर आयोजित विशेष व्याख्यान के दौरान बोल रहे थे। समारोह की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति साहित्यकार विभूति नारायण राय ने की। इस दौरान मंच पर विश्वविद्यालय के विशेष कर्तव्याधिकारी राकेश, साहित्य विद्यापीठ के अधिष्ठाता प्रो. सूरज पालीवाल उपस्थित थे।
प्रो. नामवर सिंह ने कहा कि अहिंसा के पुजारी गांधीजी क्रांतिकारियों के विचारों से असहमत होते हुए भी उनके प्रशंसक थे। वे क्रांतिकारियों की बहादुरी व साहस बल का सम्मान करते थे, क्योंकि क्रांतिकारी जुर्म के खिलाफ आवाज उठाते थे। वे मारने पर ही विश्वास नहीं करते थे अपितु मरने के लिए भी तैयार रहते थे। कायर कोई भी खतरा नहीं उठाना चाहते हैं। हमें बहादुरों की भाँति समाज में व्याप्त शोषण व जुर्म के खिलाफ आवाजें बुंलद करनी चाहिए।
प्रो. नामवर सिंह ने माओवादी समस्या के संदर्भ में कहा कि क्रांतिकारियों को आंतकवादी करार देना उचित नहीं है, माओवादी आंतकवादी नहीं हैं। नक्सलबाड़ी आंदोलन से लेकर माओवादी आंदोलन के मसलों को न तो लॉ-इन-आर्डर से हल किया जा सकता है और न ही हथियार बंदूक से मुकाबला किया जा सकता है। इसके लिए हमें 'हिन्द स्वराज' से सबक लेकर इनसे संवाद स्थापित करनी चाहिए।
प्रो. सिंह ने 'हिन्द स्वराज' नाम का उल्लेख करते हुए कहा कि हमलोग इनडिपेन्डेंस डे मनाते हैं। गांधीजी इनडिपेन्डेंस के विरोधी थे। उन्होने ''स्व'' राज पर बल दिया था। अपनी भाषा में दिल की बात कही जाती है का उल्लेख करते हुए प्रो. सिंह ने कहा कि गांधीजी अंग्रेजी पढ़े-लिखे थे, पर उन्होंने 'हिन्द स्वराज' को मातृभाषा गुजराती में लिखा, क्योंकि अपना विचार अपनी भाषा में ही व्यक्त हो सकता है।
प्रो. सिंह ने कहा कि अब न तो साम्राज्यवाद है और न ही उपनिवेशवाद । आज भूमंडलीकरण का जालतंत्र हमारे बेडरूम में घुसकर शोषण व अन्याय का कुहराम मचा रहा है। विकास के मॉडल में गरीब व्यक्ति का स्थान नहीं है। सब अमेरिका की ओर देख रहे हैं। हमें गांधीजी के विकास मॉडल से देश को सुदृढ़ करने की जरूरत है।
अध्यक्षीय उद्बोधन में कुलपति विभूति नारायण राय ने कहा गांधीजी वर्ण व्यवस्था के प्रबल विरोधी थे पर आज भी वर्ण व्यवस्था चिंता के केन्द्र में नहीं है। विशेष कर्तव्याधिकारी राकेश ने मंच संचालन के दौरान कहा कि गांधीजी ने 'हिन्द स्वराज' का संपादकीय लिखते वक्त कहा था कि यह पुस्तक बच्चों के हाथों में भी दी जा सकती है। बच्चा इस पुस्तक से न सिर्फ खेलेगा बल्कि सोचेगा, समझेगा व समाज को एक नयी दिशा देने में मददगार होगा। साहित्य विद्यापीठ के अधिष्ठाता प्रो. सूरज पालीवाल ने आभार व्यक्त किया। स्वागत पुष्पगुच्छ प्रदान कर किया गया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के शैक्षणिक, गैर-शैक्षणिक कर्मी, शोधार्थी व विद्यार्थी तथा वर्धा के गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।
अमित कुमार विश्वास (पब्लिसिटी अधिकारी)
प्रेमचन्द उम्दा सामाजिक विश्लेषक
विश्वविद्यालय में प्रेमचन्द जंयती पर प्रतिकुलपति प्रो. नदीम हसनैन का अध्यक्षीय वक्तव्य
 प्रेमचन्द जयंती समारोह में उद्बोधन देते प्रतिकुलपति प्रो. नदीम हसनैन मंच पर कुलसचिव डॉ खामरे, प्रो सूरज पालीवाल, प्रो. अनिल चमड़िया संचालक डॉ.सुनील सुमन।
प्रेमचन्द उम्दा सामाजिक विश्लेषक थे। उन्होंने -उर्दू भाषा में साहित्य रचकर समाज के लिए एक नई दिशा प्रदान की। 1936 ई. के बाद प्रेमचन्द से प्रेरित होकर समाजशास्त्रियों व मानवशास्त्रियों ने तीव्र गति से काम करना शुरू किया। समाज की चिंता को प्रेमचन्द उठा रहे थे। समाज की जो चिंता उस समय थी वह आज और भी वीभत्स रूप में हमारे सामने प्रस्तुत है । उन्होने जो समाज के लिए रोड मैप दिया, वह आज और भी प्रासंगिक हो गया है। प्रेमचन्द समय की उपज थे तथा वे समय से आगे की क्रांतिकारिता का बिगुल फूँक रहे थे ।
उक्त विचार महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति मानवशास्त्री प्रो. नदीम हसनैन के व्यक्त किए। वे साहित्यकार मुंशी प्रेमचन्द की जयंती के सुअवसर पर विश्वविद्यालय के केन्द्रीय पुस्तकालय सभागार भवन में 'आज के समय में प्रेमचन्द' विषय पर आयोजित समारोह की अध्यक्षता करते हुए बोल रहे थे। मंच पर विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ के.जी. खामरे, जनसंचार के प्रो. अनिल चमड़िया, साहित्य विद्यापीठ के अधिष्ठाता प्रो. सूरज प्रसाद पालीवाल, डॉ कृपाशंकर चौबे, डॉ.सुनील कुमार सुमन उपस्थित थे।
विषय प्रवर्तन करते हुए प्रो. सूरज प्रसाद पालीवाल ने कहा कि प्रेमचन्द वर्तमान समय की चिंता, चुनौतियों व विमर्श को अपने लेखन के माध्यम से ला रहे थे। समकालीन समय को मनुष्य व मानवता विरोधी करार देते हुए उन्होंने कहा कि सांप्रदायिकता, संकीर्णतावाद और साम्राज्यवाद तीनों भयावह रूप ले रहे हैं। उन्होंने'गोदान' के 'होरी' का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार 'होरी' को दुश्मन नहीं दीखता है, उसी प्रकार आज साम्राज्यवादी युग में दुश्मन नही दीख रहा है। अमेरिका डंडा चला रहा हैऔर हम चुप बैठे है।
प्रो. पालीवाल ने कहा कि 1919 ई. में प्रेमचन्द ने 'ज़माना' में एक लेख में लिखा था जिसमें उन्होंने कहा था कि इस देश में 90 प्रतिशत किसान हैं, और किसान सभा नहीं है। 1925 ई. मे किसान सभा बनी। प्रो. पालीवाल ने विदेशी पूंजी को जूठन व कुसंस्कारों का हवाला देते हुए कहा कि आज भी हम देश के विकास के लिए विदेशी पूंजी के आगे झुक रहे हैं। उन्होंने प्रेमचन्द के लिखे 'महाजनी सभ्यता' लेख के माध्यम से कहा कि प्रेमचन्द ने स्पष्ट संकेत दिया था कि पश्चिमी सभ्यता हमें अपने उसूलों से तोड़ देगी। आज यह सर्वथा सत्य सिध्द हो रहा है। प्रेमचन्द धन के लोभी नहीं थे। वे 1935 ई. में मुंबई में पटकथा लिख रहे थे, अच्छी कमाई हो रही थीै। समाज में व्याप्त कुरीतियों को देखते हुए उन्हाेंने अच्छी खासी कमाई छोड़कर 'गोदान' पूरा करने के लिए आ गए थे। आज के लेखकों में समाज के प्रति यह तड़प कम ही देखने को मिलती है।
विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ के.जी. खामरे ने समाज में व्याप्त अंधविश्वास को दूर करने पर बल देते हुए कहा कि हमें दूरदृष्टि रखकर समाज के विकास के बारे में सोचने की जरूरत है।
प्रो. अनिल चमड़िया ने कहा कि प्रेमचंद में समाज को बनाने की योजना थी। वे एक ऐसे बड़े रचनाकार हैं जो परिवार में सबके लिए लिखते हैं, आर्थिक संरचना व सांस्कृतिक संरचना पर कड़ा प्रहार करते हैं। वे किसानों, दलितों, स्त्री विमर्श के लिए लिखते रहे। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद को हमें समग्रता में समझने की जरूरत है।
इस अवसर पर डॉ. कृपाशंकर चौबे ने प्रेमचन्द को याद करते हुए कहा कि जिस प्रकार बांग्ला साहित्य में रवीन्द्रनाथ ठाकुर का नाम आदर के साथ लिया जाता है उसी प्रकार साहित्य में प्रेमचन्द का नाम प्रतिष्ठा के साथ लिया जाता है। प्रेमचन्द ने समाज में व्याप्त जातिप्रथा पर कुठाराघात किया। समाज में जातिप्रथा को समाप्त करने के लिए हमें टाइटल को खत्म कर देना चाहिए।
नवनियुक्त व्याख्याता अरुणेश नीरन शुक्ल ने कहा कि ऐसा माना जा रहा है कि आनेवाले समय के लिए सपने नहीं बचे, प्रतिरोध समाप्त होता जा रहा है। प्रतिरोध का मॉडल नही बचा है। प्रेमचन्द ने चेतस होकर समाज को जगाया, जिससे हम परिचित हैं। उन्होंने प्रेमचन्द के 'सभ्यता-समीक्षा' का उल्लेख करते हुए कहा कि पश्चिमी सभ्यता खतरनाक है। शोधार्थी कालू लाल कुलमी ने शिवकुमार मिश्र के सवाल का उल्लेख करते हुए कहा कि 50 वर्ष पूर्व हम जो प्रेमचन्द पढ़ रहे थे,वह आज भी ज्यों का त्यों पढ़ रहे है, इसपर हमें विमर्श करने की जरूरत है।मंच का संचालन साहित्य विद्यापीठ के व्याख्याता डॉ.सुनील कुमार सुमन ने किया तथा डॉ उमेश कुमार सिंह ने आभार माना। इस अवसर पर डॉ नृपेन्द्र प्रसाद मोदी, डॉ अशोक नाथ त्रिपाठी, सुप्रिया पाठक, शरद जायस्वाल, सहित विश्वविद्यालय के शैक्षणिक, गैर-शैक्षणिक कर्मी, शोधार्थी व विद्यार्थी उपस्थित थे।
अमित कुमार विश्वास (पब्लिसिटी अधिकारी)
मीडिया का उद्योग में परिवर्तित होना लोकतंत्र के लिए खतरा
प्रो. अनिल चमड़िया
मीडिया लोकतंत्र से जुड़ा हुआ है। मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तभ है तो इसे उद्योग के रूप में स्वीकृति नहीं दी जानी चाहिए। मीडिया का उद्योग के रूप में तब्दील होना लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है।
उक्त उद्बोधन महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के जनसंचार माध्यम एवं सम्प्रेषण विभाग में नवनियुक्त प्रो. अनिल चमड़िया ने व्यक्त किए। वे अनुवाद निर्वचन विद्यापीठ भवन में आयोजित विमर्श कार्यक्रम के दौरान 'मीडिया और उद्योग' विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में बोल रहे थे। विश्वविद्यालय के विशेष कर्तव्याधिकारी राकेश ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की।
प्रो. चमड़िया ने कहा कि मीडिया में दो संस्थाएं हैं- एक मीडियाकर्मी और दूसरा मीडिया को चलानेवाले। मीडिया में बड़ी पूंजी लग रही है। पूंजी को मुनाफ़े से मतलब होता है। सामाजिक मूल्य से उसका कोई सीधा सरोकार नहीं होता है। वर्तमान समय में लोगों में मीडिया के प्रति विश्वसनीयता कम हो रही है। हमें यह सोचने की जरूरत है कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाला मीडिया किसके लिए काम कर रहा है? भारत के विकास के संदर्भ में उन्होंने कहा कि चंद लोगों की पूंजी में बहुत ज्यादा इजाफा हो रहा है जबकि आम मजदूरी बहुत ही घट रही है। देश में करीब 83 करोड़ लोग 20 रुपये से कम में गुजारा करने को विवश है।
प्रो. अनिल चमड़िया ने 'मीडिया और उद्योग' विमर्श के दौरान व्यक्त किया कि मीडिया एक योजना के तहत आपके सोचने-समझने के रास्ते को छोटा कर रहा है। उन्होंने जवाहरलाल नेहरु के पत्र के हवाले से कहा कि 1930 में नेहरू ने कहा था कि आज के जमाने में सार्वजनिक जीवन में पत्रकारिता और पत्रकारों की भूमिका महत्वपूर्ण है। हिन्दुस्तान में या तो सरकार के जरिये या अखबारों के मालिकों के जरिये या फिर विज्ञापनदाताओं के दबाब से तथ्यों के दबाये जाने की संभावना है। लेकिन हिन्दुस्तान मंं उन खबरों को दबाने की प्रवृत्ति नहीं बढ़ेगी, जिन्हें निहित स्वार्थ पसंद नहीं करते। प्रो. चमड़ियाने कहा कि आज बाजारवादी होड़ में बिकने वाली खबरों को ही तरजीह दी जाती है।
प्रो. चमड़िया ने अपील की कि मीडिया को जनसरोकारों से जोड़ने के लिए आमजनों को आगे आना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि रिमोट आपके हाथ में है, आप अपनी मर्जी के अनुसार चैनल देखिए। यह ऐसी ही बात हो गई कि आप दाल-चावल में मिलावट होते देखकर भी मौन हो जाएँ। उन्होंने न्यायालय की अवमानना पर चर्चा करते हुए कहा कि संसद भवन पर हुए हमले का फैसला एक साल बाद 13 दिसम्बर को तय तिथि पर देना था। संयोग से उसके एक दिन पूर्व 13 दिसम्बर पर बनी फिल्म को जी टीवी पर दिखाया गया। उक्त फैसले की तिथि योजनाबध्द तरीके से बढ़ा दी गयी क्योंकि न्यायालय महसूस कर रहा था कि इस फैसले को स्वीकार नहीं किया जा सकेगा।
समारोह की अध्यक्षता करते हुए राकेश ने कहा कि मीडिया की स्वायत्तता के लिए मीडिया कर्मियों को सबके साथ जुड़ना पड़ेगा। उन्हें जनांदोलनो से भी जुड़ने की आवश्यकता होगी। उन्होंने गांधीजी के इंडियन ओपीनियन अखबार का हवाला देते हुए कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन में इसका व्यापक असर पड़ा था और उसने अंग्रेजों के खिलाफ़ जनमानस में चेतना जगाई थी। मंच का संचालन स्त्री अध्ययन विभाग के व्याख्याता शरद जायस्वाल ने किया। इस अवसर पर शोधार्थी व विद्यार्थी उपस्थित थे।
अमित कुमार विश्वास
पब्लिसिटी अधिकारी
विश्वविद्यालय का क्षेत्रीय केन्द्र (दूरस्थ शिक्षा) इलाहाबाद में उद्धाटित
विश्वविद्यालय के क्षेत्रीय केन्द्र का उद्धाटन समारोह इलाहाबाद में संपन्न हुआ। समारोह की अध्यक्षता के वरिष्ठ कथाकार अमरकान्त ने की। मुख्य अतिथि प्रो. नागेश्वर राव राजर्षि टण्डन मुक्त विश्वविद्यालय, (उ.प्र.) थे। विशिष्ट अतिथि के तौर पर दूधनाथ सिंह, रवीन्द्र कालिया, शेखर जोशी, राजेन्द्र कुमार एवं अली अहमद फातमी उपस्थित थे। अपने उद्धाटन भाषण में विश्वविद्यालय के कुलपति एवं वरिष्ठ कथाकार श्री विभूति नारायण राय ने कहा कि समाज की चिंता में विश्वविद्यालय शामिल है, की साझा सांस्कृति को आगे बढ़ाने का दायित्व यह विश्वविद्यालय निभाएगा। ज्ञान के विभिन्न अनुशासनों को में लानं का प्रयास विश्वविद्यालय द्वारा जारी है। इस अवसर पर आयोजित कविता पोस्टर प्रदर्शिनी का उद्धाटन नया ज्ञानोदय के संपादक रवीन्द्र कालिया एवं विश्वविद्यालय के प्रकाशनों के पुस्तक बिक्री केन्द्र का उद्धाटन वरिष्ठ कथाकार दूधनाथ सिंह ने किया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलसचिव श्री राकेश विशेष रूप से उपस्थित रहे। उद्धाटन समारोह का संचालन इलाहाबाद के क्षेत्रीय निदेशक संतोष भदौरिया ने किया।
भाषा चाहे हो या उर्दू किसी धर्म की थाती नहीं - विभूति नारायण राय
भाषा चाहे हो या उर्दू किसी धर्म की थाती नही है, लेकिन हकीकत ये है कि उर्दू मुसलमानों एवं हिन्दुओं की भाषा बन गई। इसी लिए मुंशी प्रेमचंद ने अपने साहित्य में हिन्दुस्तानी जबान की वकालत की थी। यह बात विश्वविद्यालय के क्षेत्रीय केन्द्र, इलाहाबाद में 'साझा संस्कृति एवं प्रेमचंद' विषयक सत्र का उद्धाटन करते हुए कुलपति विभूति नारायण राय ने कही।
सत्र की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कथाकार अमरकान्त ने कहा कि हिदुस्तान जैसे बड़े महादेश में साझा संस्कृति का मतलब सिर्फ हिन्दू और मुसलमान के बीच का साझापन ही नहीं वरन् सभी धर्मों, क्षेत्रों, भाषाओं एवं जातियों के बीच का साझापन है। इस सत्र में लाल बहादुर वर्मा, अजित पुष्कल, राजेन्द्र कुमार, अली जावेद, श्री राकेश ने भी अपने वक्तव्य प्रस्तुत किए। दूसरे सत्र ''प्रेमचंद की विरासत और संघर्षशील आमजन'' की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कथाकार मार्कण्डेय ने कहा कि प्रेमचंद को हिंदू मुस्लिम समस्या के नजरिए से नहीं, बल्कि उनकी पूरी रचनात्मकता को केंद्र में रखकर विचार करना चाहिए। इस सत्र में दूधनाथ सिंह, वीरेन्द्र यादव, ए.ए. फातमी, सगीर इब्राहिम एवं फख़रूल क़रीम ने भी अपनी बात रखी और कहा कि प्रेमचंद इसलिए महत्वपूर्ण है कि वे अपने समय में आम जनों की भागीदारी को अपनी रचनाओं के केन्द्र में लाते हैं। कार्यक्रम का संचालन क्षेत्रीय निदेशक संतोष भदौरिया नें तथा सभार ज्ञापन विशेष कर्तव्य अधिकारी (संस्कृति) श्री राकेश ने किया।
पांखड व बर्बरता साम्राज्यवाद की विशेषता - मैनेंजर पाण्डेय
किसानों, मजदूरों और निम्न मध्यवर्ग की बदहाल स्थिति के लिए समाज का पूंजीवादी चेहरा जिम्मेदार है। पूंजीवाद एवं साम्राज्यवाद हमेशा से ही किसान विरोधी रहा है। अखंड पाखण्ड व जन्मजात बर्बरता साम्राज्यवाद की स्थाई विशेषताएं हैं।

यह बातें के वरिष्ठ आलोचक प्रो. मैनेजर पाण्डेय ने आज के समय में देश की बात विषयपर विश्वविद्यालय के इलाहाबाद स्थित क्षेत्रीय केन्द्र के 'सत्य प्रकाश मिश्र सभागार' में आयोजित विशेष व्याख्यान में कहीं। उन्हाेंने अफसोस जाहिर किया कि ब्रिटिश हुकूमत की पीड़ादायक गुलामी की जंजीरों से जकड़े भारत को आजाद करने की अलख एवं जीतोड़ मेहनत जिन कलम के सिपाहियों ने की ऐसे लेखक माधव राव सप्रे, तथा सखाराम देहस्कर का नाम आधुनिक युग के लेखकों को भी याद नहीं। ऐसे में यह कहना अप्रासंगिक न होगा कि भाषा के पाठक ही नहीं, बल्कि आज के लेखक भी सांस्कृतिक विस्मरण से ग्रस्त हैं। कार्यक्रम संयोजक एवं क्षेत्रीय केन्द्र के निदेशक संतोष भदौरिया ने कार्यक्रम का संचालन किया।
क्रांतियाँ और रचनाएं कभी निसंतान नहीं होती - विश्वनाथ त्रिपाठी
क्रांतियां और रचनाएं कभी नि:संतान नहीं होती। एक क्रांति दूसरी क्रांति को जन्म देती हैं। ये बातें प्रो. विश्वनाथ त्रिपाठी ने विश्वविद्यालय के क्षेत्रीय केन्द्र ने आयोजित संगोष्ठी कविता और हमारा समय पर कहीं। उन्होंने कहा कि अमेरिका के लिए लोकतंत्र बाजारवाद का रास्ता है। हमें बाजारवाद के खतरों से कविता को बचाना है, कविता का मूल काम ऑंखे खोलना है। कार्यक्रम में वसुधा के संपादक वरिष्ठ आलोचक डा. कमला प्रसाद ने कहा कि समाज और संस्कृति का निर्माता मनुष्य है। बहुवचन पत्रिका के संपादक राजेन्द्र कुमार ने कहा कि समय से असंतुष्ट हुए बिना अच्छी रचना नहीं की जा सकती। कार्यक्रम में जगदीश चन्द्र के काव्यसंग्रह चिठ्ठी आएगी एक दिन का विमोचन किया गया। कार्यक्रम का संचालन क्षेत्रीय केंद्र के निदेशक डॉ. संतोष भदौरिया ने किया।
केदारनाथ की कविताओं में देशी ठाट - प्रो. नामवर सिंह
केदारनाथ अग्रवाल एक क्रांतिकारी कवि हैं, जिनको पढ़ने के बाद ऑंसू नहीं गिरते, मुट्ठी बंधती है। उनकी कविता में आम आदमी का देशी ठाट दिखाई देता है। कविताओं में आम आदमी, किसान और समाज के हाशिए के लोग प्रतिबिम्बित होते हैं। ये बाते वरिष्ठ आलोचक एवं विश्वविद्यालय के कुलाधिपति प्रो. नामवर सिंह ने विश्वविद्यालय के क्षेत्रीय केन्द्र में 'केदार व्याख्यान माला' की कविताओं में स्त्री का सौंदर्य, शक्ति और सहभागिता दिखाई देती है। शहरी जीवन की अछूती चीज को केदार जी नें अपनी कविता में बड़ी सलीके से जगह दी है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने कहा कि वर्धा में 'हिंद स्वराज' पर आयोजित सेमिनार में एक नए समाज का माडल पेश किया गया। जो लोग किसी कारण से गांधी दर्शन की आलोचना करते थे। उनका झुकाव भी गांधी दर्शन की तरफ बढ़ेगा।
कार्यक्रम के द्वितीय सत्र में मुख्य अतिथि ने कवि दिनेश कुमार शुक्ल को उनके काव्यसंग्रह 'ललमुनियां की दुनिया' के लिए केदार सम्मान दिया गया। विश्वविद्यालय के विशेष कर्तव्य अधिकारी श्री राकेश जी इस अवसर पर विशेष अतिथि थे। कार्यक्रम का संचालन क्षेत्रीय निदेशक संतोष भदौरिया नें किया।
तिरंगे की शान को रखें बरकरार
ध्वजारोहण समारोह के दौरान कुलाधिपति प्रो. नामवर सिंह का उद्बोधन
महात्मा गांधी के नाम पर के लिए स्थापित अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय देश का एक अनूठा विश्वविद्यालय है। यह विश्वविद्यालय समाज के लिए पथ-प्रदर्शक हो तथा तिरंगे की 'आन-बान-शान' को बरकरार रखे। हमारा तिरंगा एकता का प्रतीक है। किसी भी परिस्थिति में हमारी सांस्कृतिक व भाषाई एकता क्षीण न होने पाए।
 ध्वजारोहण करते कुलाधिपति प्रो. नामवर सिंह साथ में कुलपति साहित्यकार विभूति नारायण राय, प्रतिकुलपति प्रो. नदीम हसनैन व अन्य।
उक्त विचार महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलाधिपति सुविख्यात साहित्यकार प्रो. नामवर सिंह ने व्यक्त किए। वे विश्वविद्यालय परिसर में स्वतंत्रता दिवस के सुअवसर पर ध्वजारोहण करने के उपरान्त समारोह को संबोधित कर रहे थे। समारोह की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति साहित्यकार विभूति नारायण राय ने की।
प्रो. नामवर सिंह ने भारतीय संस्कृति को फूलों के गुलदस्ते के समान बताते हुए कहा कि जिस प्रकार गुलदस्ते में भिन्न-भिन्न प्रकार के फूलों से उसकी शोभा बढ़ती है उसी प्रकार यहां भिन्न-भिन्न जाति एवं धर्म के लोग गुलदस्ते के समान एकता के प्रतीक के रूप में हैं। हमें भारत की एकता व अस्मिता की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहने की जरूरत है। साथ ही हमें शोषण व अन्याय के प्रति आवाज़ बुलंद करनी चाहिए। उन्होंने इस समारोह में आमंत्रित करने के लिए विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय को धन्यवाद देते हुए कहा कि मैं यहाँ आकर प्रफुल्लित हूँ
ध्वजारोहण करने के उपरान्त प्रो. नामवर सिंह ने विश्वविद्यालय के प्रशासनिक भवन का उद्धाटन किया साथ ही परिसर में वृक्षारोपण भी किया। इस दौरान उन्होंने प्रशासनिक भवन का मुआयना किया तथा कुलपति राय को नये कक्ष में कुर्सी पर बैठाया। प्रो. सिंह ने 1.6 किलोमीटर लंबे प्रेमचंद मार्ग तथा प्रतिष्ठित वाणी प्रकाशन के बिक्री केन्द्र का उद्धाटन किया। उन्होंने विश्वविद्यालय परिसर में द्रुत गति से बने फादर कामिल बुल्के अंतरराष्ट्रीय अतिथि गृह व सावित्रीबाई फुले महिला छात्रावास को भेंट दी।
इस अवसर पर कुलपति विभूति नारायण राय, प्रतिकुलपति प्रो. नदीम हसनैन, कुलसचिव डॉ. कैलाश खामरे, विशेष कर्तव्याधिकारी राकेश, श्रीमती पद्मा राय, विशेष कर्तव्याधिकारी नरेन्द्र सिंह, समाजसेवी अनिल नरेडी, डॉ. सोहन पण्डया, के. आर. बजाज सहित विश्वविद्यालय के शैक्षणिक, गैर-शैक्षणिक कर्मी, शोधार्थी, विद्यार्थी व वर्धा के प्रतिष्ठित नागरिक उपस्थित थे। ध्वजारोहण कार्यक्रम के दौरान वर्धा होमगार्ड दल ने कुलाधिपति प्रो. नामवर सिंह को पारंपरिक सलामी देते हुए राष्ट्रगान की धुन बजाई।
अमित कुमार विश्वास
पब्लिसिटी अधिकारी
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