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University : News

 MGAHV to organize Photo Exhibition on Beijing Olympic

हिन्दी विश्वविद्यालय में भारतवंशी अध्ययन केन्द्र की स्थापना

साहित्य और कला की संवेदनाओं को बचाने की आवश्यकता

हिन्दी विश्वविद्यालय के पाठयक्रम अब यूरोपीय देषों में भी

 

 

MGAHV to organize Photo Exhibition on Beijing Olympic

 

Wardha, March 28: Mahatma Gandhi Antarrashtriya Hindi Vishwavidyalaya (MGAHV) and the Consulate General of the People's Republic of China in Mumbai are jointly organizing a Photo Exhibition and Film Festival on Chinese Culture, Society, Paintings and Beijing Olympic Games from April 1 - 4, 2008 at the University extension centre at Jajuwadi, Wardha, Maharashtra. H.E. Zhang Weiguo, Consul-General will inaugurate the function on April 1 at 3 P.M. Prof. G. Gopinathan, Vice-Chancellor, MGAHV and Mr. Wen Jian, News Correspondent of Xinhua News Agency in Mumbai will also be present there. The objective of the programme is to promote cultural and educational relations between India and China, said Mr. Anirban Ghosh, Lecturer in Chinese Language. Exhibition will be on view from April 2 - 4 from 10 AM to 6 PM. It will also include Chinese, Spanish and French movie festival for the benefit of Indian and foreign language students. Several Chinese guests and other dignitaries will also attend the programme.

 Since September 2007, the University has started two-year translation and interpretation courses in Chinese - Hindi, Spanish - Hindi and French - Hindi Languages. MGAHV is a Central University established by an act of Parliament in 1997 to promote Hindi Language and Indian Culture at the international level

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बोलचाल भाषा के रुप में एशिया, आफ्रिका, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया सब कहीं हिन्दी लोकप्रिय हो रही है। संघ की राजभाषा की रुप में हिन्दी को देश और विदेश में प्रचारित करने का दायित्व भारत सरकार का बनता है। उससे भी बढकर इस क्षेत्र में काम करनेवाले हिन्दी के विद्वानों और हिन्दी के हितैषियों का कर्तव्य बनता है कि विश्व भाषा के रुप में हिन्दी के विकास एवं उसकी समस्याओं पर चिंतन करें और कुछ व्यवहारिक  कदम उठाएँ। जनसंचार एवं फिल्म आदि क्षेत्र में लोकप्रिय माध्यम बन जाने के कारण हिन्दी की लोकप्रियता पूरे विश्व में बढ़ रही है। गांधीजी के स्वप्न के अनुसार उपनिवेशवादी बडी भाषाओं के तुलना में हिन्दी को राष्ट्रव्यापी एवं विश्वव्यापी विकल्प के रुप में लाने की आवश्यकता है। लेकिन उसके लिये हिन्दी को सूचना प्रोद्योगिकी तथा अन्य नये तकनीकी विषयों से जोड़ना होगा। भारतवंशी लोगों के लिये हिन्दी अपनी सांस्कृतिक अस्मिता की भी प्रतिक है।

दि. 15-16 मार्च 2008 : जनसंचार माध्यम एवं सम्प्रेषण विभाग की कार्यशाला

              पत्रकारिता से समाज में परिवर्तन लाए - पीटर ने

हिन्दी विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित 'टेलीविजन समाचार लेखन एवं प्रस्तुतीकरण' कार्यशाला का उद्धाटन

वर्धा दि. 16 : पत्रकारिता समाज में परिवर्तन लाने का एक प्रभावी माध्यम है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े आज के युवाओ में कुछ करने का जज्बा और शक्ति है और उन्हें इस माध्यम से समाज में परिवर्तन लाने का कार्य करना चाहिये। उक्त विचार जर्मनी के सुप्रसिध्द पत्रकार एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विशेषज्ञ पीटर मे ने व्यक्त किये। महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के जनसंचार माध्यम एवं सम्प्रेषण विभाग की ओर से 'टेलीविजन समाचार लेखन एवं प्रस्तुतीकरण' विषय पर आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला के उद्धाटन के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जी. गोपीनाथन ने की।

     शनिवार दि. 15 मार्च को विश्वविद्यालय के जाजूवाडी स्थित विस्तार कार्यालय में कार्यशाला का उद्धाटन  हुआ। उद्धाटन सत्र में विशिष्ट अतिथि के रूप में दैनिक भास्कर के संपादक श्री प्रकाश दुबे, नागपुर तथा विषय विशेषज्ञ के रूप में 'आज तक' के सीनियर प्रोडयुसर हर्ष रंजन, दिल्ली, 'राष्ट्रीय सहारा' चैनल के खेल सम्पादक संजय बेनर्जी, दिल्ली तथा विवि के प्रो. आत्मप्रकाश श्रीवास्तव व अतिथि संपादक डॉ. विजय कुलश्रेष्ठ उपस्थित थे।

     श्री पीटर में ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिये समाचार लेखन से संबंधित अनेक पहलुओं की चर्चा करते हुये समाचार प्रस्तुति, विश्लेषण, समाचार निर्मिती, समाचारों की विषय-वस्तु तथा समाचार तैयार करते समय उसकी महत्ता को अपने अनुभव व्यक्त किये। उन्होंने एक की खबर को बार-बार दिखाये जाने पर खेद व्यक्त करते हुये कहा कि इससे खबर के असर पर प्रभाव पड़ता है। उन्होंने बताया कि मीडिया कर्मी ने अपनी श्रोताओं की पसंद को ध्यान में रखकर खबर तैयार करनी चाहिये और खबर का विश्लेषण और निर्मिती के पहलुओं पर भी ध्यान देना चाहिये। दैनिक भास्कर के संपादक प्रकाश दुबे ने कहा कि मोबाइल आने के बाद भी घड़ी की महत्ता कायम है। अखबार  और पत्रिकाओं में लिखने के तरीके अलग-अलग है, तथापि इस पर ठीक प्रकार से अंमल नहीं किया जाता। समाचार प्राप्त करने के अनेक साधन आज मौजूद होते हुये भी साधनों के साथ चुनौतिया बदली है। उन्होंने हिन्दी का पहला अखबार 'उदन्त मार्तण्ड' का उदाहरण देकर कहा कि पुराने जमाने में अखबार ही सूचना प्रेषण का एकमात्र साधन था। टेलीविजन समाचार लिखते समय भाषा और उसके अर्थ पर ध्यान देने की आवश्यकता पर बल देते हुये कहा कि पत्रकार बनने के बाद पढ़ना, लिखना और सिखना भी जारी रखना चाहिये। उन्होंने टेलीविजन के द्वारा लोगों को चौकाने वाली घटनायें दिखाने से बचना चाहिये और यदि ऐसा होता है तो उसका विरोध करना चाहिये।

     अध्यक्षीय उद्बोधन में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जी. गोपीनाथन ने पत्रकारिता के माध्यम से समाज को शिक्षित करना चाहिये और समकालीन इतिहास को पाठकों के सामने लाना चाहिये। चैनलों की बढ़ती संख्या के बारे में उन्होंने कहा कि बाजार बनाने के लिये इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों का उपयोग किया जा रहा है, परंतु उसमें कितनी नैतिकता है इसपर ध्यान देना चाहिये। उन्होंने अपील की कि तथ्य और सत्य को रंग देकर पाठकों गुमराह करने के बजाय संस्कृति, ज्ञान-विज्ञान, पर्यावरण तथा स्वास्थ्य के बारे में जानकारी देकर लोगों को जागरूक करना चाहिये। महात्मा गांधी की पत्रकारिता को याद करते हुये उन्होंने गांधीजी की पत्रकारिता का अनुसरण करने की सलाह देकर पत्रकारिता के माध्यम से पत्रकारों ने समाज में वैचारिक क्रांति लाने का कार्य करने की अपील कार्यशाला में उपस्थित छात्र तथा पत्रकारों को दी। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में हिन्दी और अंग्रेजी का अपमिश्रण एवं अवमिश्रण होने लगा है, इससे बचने के लिये सामान्य बोल-चाल के शब्द अन्य भाषाओं से भी लेने का आह्वान उन्होंने अपने संबोधन में किया।

     विवि के विश्वकोश परियोजना के अतिथि संपादक डॉ. विजय कुलश्रेष्ठ ने कहा कि समाचार को समाचार ही रहने दिया जाये उसकी आत्मा को न छेडे अौर समाचार और व्यूज में संतुलन बनाना चाहिये। कार्यक्रम के प्रारंभ में उपस्थित अतिथियों का डॉ. संतोष भदौरिया, डॉ. अनवर अहमद सिद्दीकी, अमित राय, अमरेन्द्र शर्मा, डॉ. अन्नपूर्णा चेरला ने पुष्पगुच्छ से किया। कार्यक्रम का संचालन जनसंचार माध्यम एवं सम्प्रेषण विभाग के प्रभारी श्री धरवेश कठेरिया ने किया तथा आभार डॉ. संतोष भदौरिया ने माना। कार्यशाला के द्वितीय सत्र 'टेलीविजन समाचार लेखन' पर हुआ जिसमें आज तक के हर्ष रंजन और सहारा समय के संजय बेनर्जी ने भाग लिया। कार्यक्रम में डॉ. के. एम. मालती, डॉ. नृपेन्द्र प्रसाद मोदी, डॉ. किशोर वासवानी, डॉ. अनिल दुबे, डॉ. अशोकनाथ त्रिपाठी, बी. एस. मिरगे, प्रा. शेख हाशम, शैलेष कदम मरजी, गिरिश पांडे, शहनाज सिद्दीकी, नटराज वर्मा, राजीव पाठक, विभाग के छात्र-छात्राएं प्रमुखता से उपस्थित थे।

 

हिन्दी विश्वविद्यालय में भारतवंशी अध्ययन केन्द्र की स्थापना

प्रवासी भारतीयों में भारत के प्रति प्रेम और आदर की भावना

हॉलेण्ड के प्रो. मोहन कान्त गौतम का प्रतिपादन

वर्धा, दि. 19 02 2008 :

भारत के बाहर बसे भारतीयों में भारत के प्रति प्रेम और आदर की भावना है और वे लोग भारतीय संस्कृति को संजोए हुए है। यह विचार यूरोप हिन्दी समिति, हॉलेण्ड के अध्यक्ष प्रो. मोहन कान्त गौतम ने व्यक्त किये। वे महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में 'भारतवंशी अध्ययन केन्द्र' के उद्धाटन के अवसर पर 'भारतवंशी और वैश्विक संस्कृति' विषय पर आयोजित विशेष व्याख्यान में संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जी. गोपीनाथन ने की। मंच पर पुणे विश्वविद्यालय के भाषा विज्ञान के पूर्व प्रो. उमाशंकर उपाध्याय तथा विश्वविद्यालय के प्रो. पाण्डेय शशिभूषण सिंह 'शीतांशु' उपस्थित थे।

     विश्वविद्यालय में आयोजित कार्यक्रम में प्रो. गौतम ने कहा कि सुरीनाम, गयाना और मॉरिशस में प्रवासी भारतीय समाज प्रगति कर रहा है और वहाँ के लोगों में भारत के प्रति आस्था भी है। उन्होंने प्रवासी भारतवंशी कौन है, क्या वे भारतीय के पूरी तरह प्रतिरूप है और भारत के प्रति उनका कैसा गठबंधन है आदि विषय पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि सन 1780 से भारतीय लोगों का विदेशी देशों मे प्रवास आरंभ हुआ था। श्रमिक के रूप में मांग को देखते हुए भारत से श्रमिक किसान विभिन्न देशों में जाते रहे। जमैका, सेंट लुइस,टोबेगो, सुरीनाम, फिजी और फिलिपिन्स में भारतीय गये। पांच वर्ष के ठेके पर ये लोग गये परंतु कुछ लोग वही रह गये। इन प्रवासी भारतीयों को 'अर्काटी' और 'गिरमिटिया' कहा जाता था। कई वर्ष विदेशों में बिताने के बाद भी उनके मन में भारत के प्रति प्रेमभावना रही और वह आज भी कायम है। उन्होंने भारत सरकार द्वारा 'प्रवासी भारतीय दिवस' मनाने की पहल को प्रवासी भारतीयों को अपने साथ जोड़ने की दृष्टि से एक सार्थक प्रयास बताया। उन्होंने कहा कि भारत के विकास में प्रवासी भारतीय हांथ बंटाना चाहते है और इसके लिए भारत सरकार को और सकारात्मक कदम उठाने होंगे। हॉलेण्ड के बारे में उन्होंने कहा कि वहाँ करीब सवा दो लाख भारतीय है। वे ओएचएम नामक रेडिओ और टी.वी. चैनल भी चलाते है जिसमें भारतीय संस्कृति पर आधारित कार्यक्रम दिखाये जाते है। उन्होंने बताया कि भारतवंशी लोगों ने हिन्दी को सुरक्षित रखा है।

     अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कुलपति प्रो. जी. गोपीनाथन ने विश्वविद्यालय में भारतवंशी अध्ययन केन्द्र की स्थापना को ऐतिहासिक बताया। उन्होंने ने कहा कि विश्वविद्यालय में अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी संग्रहालय, आर्काइव्ज स्थापित हो रहा है जिसके अन्तर्गत डायस्फोरा स्टडी सेन्टर स्थापित होंगे जिसके अन्तर्गत कार्यशाला, संगोष्ठियां आयोजित की जाएंगी और इससे संबंधित प्रकाशन आदि का कार्य भी किया जाएगा। हिन्दी का अन्तरराष्ट्रीय प्रयोग कोश तैयार करने की जानकारी भी कुलपति प्रो. गोपीनाथन ने इस अवसर पर दी।

     कार्यक्रम का संचालन व्याख्याता श्री राकेश मिश्र ने किया तथा आभार श्री धरवेश कठेरिया ने व्यक्त किया। इस अवसर पर डॉ. के. एम. मालती, विश्वविद्यालय के प्रो. आत्मप्रकाश श्रीवास्तव, प्रो. लेला कारूण्यकार, वित्ताधिकारी श्री एस. के. अय्यर, उपकुलसचिव सरदार सिंह, कादर नवाज खान, डॉ. अन्नपूर्णा, डॉ. किशोर वासवानी, डॉ. हनुमान प्रसाद शुक्ल, डॉ. धूपनाथ प्रसाद, डॉ. विजय कुलश्रेष्ठ, डॉ. नृपेन्द्र प्रसाद मोदी, डॉ. अशोक नाथ त्रिपाठी, डॉ. अनवर अहमद सिद्दीकी, डॉ. अनिल कुमार पाण्डेय, डॉ. अनिल दुबे, आनंद मलयज, आशीष ठाणेकर, व्याख्याता शीला बोदरा, सुप्रिया पाठक, अवंतिका शुक्ल, बी. एस. मिरगे, अनिर्वाण घोष कन्हैया त्रिपाठी, कमल शर्मा, तथा छात्र-छात्राएं प्रमुखता से उपस्थित थें।                   

 

साहित्य और कला की संवेदनाओं को बचाने की आवश्यकता

                                  डॉ. के.एम. मालती 

वर्धा दि. 27 फरवरी 2008 :

     आज के दौर में साहित्य और कला की संवेदनाओं को बचाने की आवश्यकता है। श्री राकेश मिश्र ने अपनी कहानियों द्वारा उपभोक्तावाद के दौर में इन संवेदनाओं को स्वर दिया है। उक्त विचार सुविख्यात साहित्यकार डॉ. के. एम. मालती ने व्यक्त किये।

     महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के प्रकाशन विभाग द्वारा विश्वविद्यालय के व्याख्याता श्री राकेश मिश्र का पहला कहानी संग्रह 'बाकी धुऑं रहने दिया' पर आयोजित पुस्तक चर्चा में वे मुख्य अतिथि के रूप में बोल रही थी। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जी. गोपीनाथन ने की। कार्यक्रम में अतिथि के रूप में बिंजानी महिला कॉलेज, नागपुर के डॉ. बसंत त्रिपाठी तथा चर्चाकार के रूप में विश्वविद्यालय के विश्वकोश परियोजना के परामर्शदाता एवं साहित्यकार प्रो. पाण्डेय शशिभूषण 'शीतांशु', प्रो. विजय कुलश्रेष्ठ, व्याख्याता डॉ. संतोष भदौरिया, अमरेन्द्र कुमार शर्मा उपस्थित थे।

डॉ. मालती ने आगे कहा की आज के जमाने में कहानी कहने के तरीके में बदलाव आया है और जो बात कही जा रही है उसे व्यक्त करने के अंदाज में भी परिवर्तन आया है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुये प्रो. जी. गोपीनाथन ने कहा कि कहानी सुनाना और लिखना एक कला है। 'बाकी धुऑं रहने दिया' में लेखक राकेश मिश्र ने इस कला को अच्छी तरह प्रस्तुत किया है। उनकी कहानी पेश करने की शैली पाठकों पर प्रभाव डालती है। कहानी का विमर्श एक रासायनीक प्रक्रिया के रूप में अभिव्यक्त होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अपने कहानी संग्रह के माध्यम से श्री राकेश मिश्र ने युवा वर्ग के समक्ष एक आदर्श प्रस्तुत किया है।

इस अवसर पर डॉ. बसंत त्रिपाठी, प्रो. पाण्डेय शशिभूषण 'शीतांशु', प्रो. विजय कुलश्रेष्ठ, व्याख्याता डॉ. संतोष भदौरिया और अमरेन्द्र कुमार शर्मा आदि ने भी कहानी संग्रह पर चर्चा करते हुए अपने विचार रखें। कार्यक्रम का संचालन व्याख्याता संदीप सपकाले ने किया तथा आभार प्रकाशन विभाग के प्रभारी डॉ. धूपनाथ प्रसाद ने व्यक्त किये। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के दूर शिक्षा विभाग के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. एम. एम. मंगोडी, साहित्य विभाग के व्याख्याता एवं कहानीकार डॉ. उमेश कुमार सिंह, डॉ. किशोर वासवानी, डॉ. अवनर अहमद सिद्दीकी, डॉ. अशोकनाथ त्रिपाठी, व्याख्याता मनोज राय, डॉ. संजीव नरवाडे, अमित राय, आनन्द मण्डित मलयज, डॉ. अनिल दुबे, अर्चना शर्मा, श्रीमती सपकाले, शंभू जोशी आदि उपस्थित थे।

हिन्दी विश्वविद्यालय के पाठयक्रम अब यूरोपीय देषों में भी

हंगरी से लौटकर कुलपति प्रो. जी. गोपीनाथन ने दी जानकारी

 

5 नवम्ब 5 Nov  2007

 

महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा द्वारा प्रस्तावित आदर्श पाठयक्रमों के आधार पर यूरोपीय देशों के विश्वविद्यालयों में पाठयक्रम चलाये जाने का महत्वपूर्ण एवं ऐतिहासिक निर्णय हंगरी की राजधानी बुदापैश्त में अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी कार्यशाला में लिया गया। यह जानकारी वर्धा स्थित अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जी. गोपीनाथन ने दी।

    कार्यशाला में लिए गये निर्णय के बारे में विस्तार से बताते हुए प्रो. जी गोपीनाथन ने कहा कि महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा एवं केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा द्वारा प्रस्तावित आदर्श पाठयक्रमों के आधार पर यूरोप के प्रत्येक विश्वविद्वालयों में अपने विशिष्ट पाठयक्रमों को भी जोड़कर स्नातक एवं स्नातकोत्तर हिन्दी पाठयक्रम संचालित किए जाएंगे।

    यह हिन्दी कार्यशाला हंगरी की राजधानी बुदापैश्त में ओत्वोश लोरांद विश्वविद्यालय एवं भारतीय दूतावास के सहयोग से 24 से 27 अक्तूबर 2007 के दरम्यान आयोजित की गई। आगे उन्होंने बताया कि इस कार्यशाला में भारत, पोलेन्ड, चैक, युक्रेन, रोमानिया, आस्ट्रिया, बल्गारिया, सेरडिया एवं हंगरी के लगभग 25 विद्वानों ने भाग लिया। कार्यशाला के उद्धाटन समारोह में प्रो. जी. गोपीनाथन का बीज भाषण हुआ। अपने वक्तव्य में उन्होंने महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय द्वारा चलाये जा रहे विविध रोज़गाराभिमुख पाठयक्रमों की जानकारी कार्यशाला में उपस्थित विद्वानों को दी। कार्यशाला का विधिवत उद्धाटन ऐलतै विश्वविद्यालय के कुलपति फेरैंत्स हुदैत्स द्वारा किया गया। उद्धाटन समारोह में भारतीय राजदूत रंजीत राय और विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव वी. पी. हरन विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित थे।

    प्रो. गोपीनाथन ने आगे कहा कि इस समय यूरोप के कई छोटे-छोटे देश जैसे एस्तोनिया, लाटविया आदि में भी हिन्दी की तीव्रतर मांग है और इसके लिए इन देशों में हिन्दी अध्यापकों को प्रतिनियुक्ति पर भेजने का अनुरोध भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद से किया गया है। महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा केन्दीय हिन्दी संस्थान, आगरा एवं विदेश मंत्रालय के सहयोग से हिन्दी भाषा प्रौद्योगिकी, हिन्दी अनुवाद प्रौद्योगिकी एवं हिन्दी तुलनात्मक साहित्य जैसे प्रस्तावित विषयों में इन देशों में नवीकरण पाठयक्रम आयोजित करेगा। उन्होंने यह भी कहा कि हिन्दी के अन्तरराष्ट्ररीय पाठयक्रमों  के अन्तर्गत विदेशी विद्वानों के सहयोग से मल्टीमीडिया सामग्री के निर्माण के लिए महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, एन.सी.ई.आर.टी. एवं सी-डैक का  संयुक्त रूप से एक संघ बनेगा जिसका संयोजन विदेश मंत्रालय करेगा। केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय और राजभाषा विभाग से भी इसके लिए मदद ली जायेगी। हिन्दी के द्विभाषी एवं बहु