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bullet बहुवचन, पुस्तक वार्ता और विमर्श का लोकार्पण

दिल भरा है... वैसे ही जैसे यह हॉल भरा है: के वरिष्ठतम आलोचक और महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के कुलाधिपति प्रो. नामवर सिंह ने जब त्रिवेणी सभागार नई दिल्ली में यह वाक्य कहा तो बरबस लोगों का ध्यान गया कि खचाखच भरे त्रिवेणी सभागार में न सिर्फ साहित्य बल्कि इतिहास, समाजशास्त्र, नाटक, पत्रकारिता जैसे तमाम अनुशासनों की जानीमानी हस्तियाँ विराजमान थी।
bahuvachan
mअवसर था महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय की तीन महत्वपूर्ण पत्रिकाओं बहुवचन लैंग्वेज डिस्कोर्स एण्ड राइटिंग तथा पुस्तकवार्ता के नये स्वरूप एवं कलेवर में प्रकाशित अंको के लोकार्पण का ! इनको लोकार्पित करने के लिये जहाँ मंच पर कुलाधिपति नामवर सिंह एवं कुलपति विभूति नारायण राय के साथ वरिष्ठ कवि कुँवर नारायण, पूर्व कुलपति एवं कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी, प्रख्यात संपादक एवं कलाकार राजेन्द्र यादव बैठे थे वही इसके साक्षियों में प्रो. सुधीरचंद्र, प्रो. निर्मला जैन, रवीन्द्र कालिया, राज बिसारिया, पद्मा सचदेव, प्रो. सुधीर पचौरी, अखिलेश, देवेन्द्रराज अंकुर, ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, अभय कुमार दूबे, नीलाभ, गंगाप्रसाद विमल, उपेन्द्र कुमार, अनंत विजय, रविकांत जैसी हस्तियाँ मौजूद थी।

प्रो. नामवर सिंह ने आगे कहा कि ये पत्रिकाएँ सिर्फ विश्वविद्यालय की ही सम्पत्ति नहीं है, बल्कि समूचे समाज का भी इनपर हक है। इसलिये इसके संपादको को लगातार इस बात पर चौकस रहना होगा कि की बहुलता और इसकी लोकतांत्रिकता किसी भी तरीके से बाधित न होने पाये। उन्होंने खासकर पुस्तक वार्ता की चर्चा करते हुए एक ऐसे टीम की आवश्यकता पर जोर दिया जो समीक्षा पुस्तकों के संदर्भ में संपादक को उचित सुझाव दे सके।

बहुवचन के नये स्वरूप का लोकार्पण करते हुए वरिष्ठ कवि कुँवर नारायण ने पत्रिका के नये स्वरूप पर प्रसन्नता जाहिर की और यह उम्मीद जताई कि इन पत्रिकाओं में अकादमिकता और सर्जनात्मकता का विलक्षण संयोग दिखाई पडेग़ा।

विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और कवि आलोचक अशोक वाजपेयी ने : लैग्वेज डिस्कोर्स एवं राइटिंग का लोकार्पण करते हुए कहा कि जब उन्होंने इन पत्रिकाओं की अवधारणा समाज के सामने रखी थी तो इस बात को समझने में लोगों ने काफी वक्त लिया कि पढ़ने-पढ़ाने के अलावा तमाम विश्वविख्यात विश्वविद्यालय अपने महत्वपूर्ण प्रकाशनों से जाने गये। अपनी अवधारणाओं की स्वीकृति से प्रसन्न वाजपेयी जी ने आगे कहा कि में उन शोधार्थियों और अध्येताओं के काम को भी स्थान मिलना चाहिये जो विदेशों में रहकर अपना काम कर रहे हैं।

पुस्तक वार्ता के नये स्वरूप का लोकार्पण करते हुए राजेन्द्र यादव ने संस्थानिक पत्रिकाओं के सामाजिक भूमिका के उचित निर्वहन के प्रति अपनी आशंकाएँ जताईं। उन्होंने इतिहास में सरस्वती और चाँद के हवाले से कहा कि व्यक्तिगत प्रयासों से निकलने के कारण ही चाँद से ज्यादा क्रांतिकारी साबित हो सका। उन्होंने अशोक वाजपेयी पर चुटकी लेते हुए कहा कि संस्थानिक पत्रिकाओं में कला के सुरक्षित इस्तेमाल से किसी को न तो दिक्कत होती है और न ही उसमें कोई जोखिम ही होता है। इस अवसर पर तीनों पत्रिकाओं के नये संपादकों ने भी अपनी संपादकीय नीति पर चर्चा की। बहुवचन के नये संपादक प्रो. राजेन्द्र कुमार ने साहित्य में बहुलतावाद के प्रति अपनी आस्था पर पुरजोर विश्वास व्यक्त किया और कहा कि बहुवचन सच्चे अर्थों में 'हजार फूलों को खिलने दो' का प्रतिबिम्ब साबित होगा।

की नई संपादिका महत्वपूर्ण कहानीकार ममता कालिया ने यह विश्वास व्यक्त किया कि जो महत्वपूर्ण जिममेदारी उनके पास आई है, जिसके माध्यम से समूचे विश्व में की समुचित स्वीकृति संभव हो सके इसमें व्यापक समाज का सहयोग उन्हें प्राप्त होगा। उन्होंने अंकों की स्वायत्तता के लिये विश्वविद्यालय के प्रति आभार भी व्यक्त किया।

पुस्तक-वार्ता के नये संपादक भारत भारद्वाज ने कहा कि स्कूल जीवन से वह पत्रिकाओं के संपादक रहे हैं। अव विश्वविद्यालय की पत्रिका के संपादन का अवसर पाकर वे गौरवान्वित है और वे व्यापक समाज भी अपेक्षाओं पर अवश्य खरा उतरेंगे।

प्रारंभ में विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय की पत्रिकाओं में कुलपति का नाम प्रधान सम्पादक के रूप में जाय, इसका कोई औचित्य उन्हें नहीं लगता। इसलिए उन्होंने निर्णय लिया कि सभी पत्रिकाओं के संपादक अपने चयन में स्वतंत्र होंगे, और उन्हें किसी भी तरह के दबाव में आने की जरूरत नहीं होगी।

कार्यक्रम का संचालन विश्वविद्यालय के संस्कृति विभाग के व्याख्याता राकेश मिश्रा ने किया तथा आभार विश्वविद्यालय के कुलसचिव राकेश ने माना।



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