ea-xka-va-fg-fo- fooj.k
dye ls
iz'kklu
vdknfed
vuqla/kku ,oa fodkl
ea-xka-va-fg-fo-izdk'ku
lqpuk dk vf/kdkj
okf"kZd izfrosnu
lkekU; iz'u
 
Distance Education
 University News : University to Launch Courses in Europe Applications are invited for admission to the following courses being offered at the Centre for Distance Education, Mahatma Gandhi Antarrashtriya Hindi Vishwavidyalaya for the academic session 2007-08

संस्कृतिविद्यापीठ

Back to School and Centresडॉ. भदन्त आनन्द कौसल्यायन बौध्द  अध्ययन पीठ

स्थापना एवं इतिहास

महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा में सर्वप्रथम सन् 2004 में डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर की जयंती मनायी गयी। जयंती कार्यक्रम के अध्यक्ष तत्कालीन कुलपति प्रो. जी. गोपीनाथन ने डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर के हिन्दी प्रेम एवं भारतीय संविधान निर्माण के महती कार्य तथा भारत में बौध्द  धम्म को पुन: जीवित करने की महागाथा को सामने रखा। दलितों तथा आदिवासियों के जीवन-यापन एवं संस्कृति के अध्ययन तथा उनके विकास को नई दिशा प्रदान करने की दृष्टि से विश्वविद्यालय में 'डॉ. अम्बेडकर दलित एवं जनजातीय अध्ययन केन्द्र' की स्थापना की आधारशिला भी इसी जयंती कार्यक्रम के अन्तर्गत रखी गयी। महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के अन्तर्गत डॉ. अम्बेडकर दलित एवं जनजातीय अध्ययन केन्द्र के साथ डॉ. डॉ. भदन्त आनन्द कौसल्यायन बौध्द  अध्ययन पीठ' का होना, उच्च शिक्षा में अध्ययन तथा शोध के सामाजिक, सांस्कृतिक सरोकारों को प्रस्तुत करता है। जिस प्रकार विश्वविद्यालय का नाम राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम पर है, उसी प्रकार दलित एवं जनजातीय अध्ययन केन्द्र का नाम डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर के नाम पर है। उसी क्रम में बौध्द अध्ययन के इस पीठ का नाम डॉ. भदन्त आनन्द कौसल्यायन के नाम पर रखे जाने की परिकल्पना प्रो. जी. गोपीनाथन कुलपति ने भ. जी. के हिन्दी प्रचार-प्रसार के महती कार्यों को देखकर रखी थी। इस  प्रकार आनेवाली पीढ़ियों के लिए यह विश्वविद्यालय इसका केन्द्र तथा पीठ महत्तवपूर्ण शैक्षिक मिसाल कायम करता है।

izos'k lwpuk
ijh{kk
jkstxkj lwpuk
lqfo/kk,Wa
fØ;kdyki eap
fufonk lwpuk
vk;kstu
mi;ksxh lEidZ
 
 
blank

क. महात्मा गांधी
ख. डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर
ग. डॉ. भदन्त आनन्द कौसल्यायन
महात्मा गांधी तथा डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर का जीवन एवं कार्य लगभग आम भारतीय को ज्ञात है। किन्तु डॉ. भदन्त आनंद कौसल्यायन के विषय में उनके हिन्दी योगदान पर अब तक हिन्दी के छात्र, और अध्येता और अध्यापक कम ही जानते होंगे।

राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के प्रधानमंत्री के रूप में डॉ. भदन्त आनंद कौसल्यायन
 

प्रो. अनन्तराम त्रिपाठी, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के प्रधानमंत्री हैं। आपके साथ डॉ. भदन्त आनंद कौसल्यायन के सम्बन्ध में हुए वार्तालाप की संक्षिप्त प्रस्तुति।
राहुल सांस्कृत्यायन के प्रभाव से डॉ. भदन्त आनंद कौसल्यायन हिन्दी से जुड़े हुए थे। पुरुषोत्तामदास टंडन ने उन्हें इलाहाबाद से वर्धा भेजा वह समय राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के लिए बड़ा ही कठिन समय था। ऐसे मोड़ पर भदन्तजी ने समिति का काम संभालकर नई संजीवनी प्रदान की, एवं समिति को वैभव प्राप्त कराया।
डॉ. भदन्त आनंद कौसल्यायन ने यहाँ 11साल काम किया। राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के सचिव तथा प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने हिन्दी भाषा के बड़े उत्साह एवं समर्पित भाव से सेवा की। आज यहाँ जो कुछ समिति का वैभव दिख रहा वह सब भदन्तजी के परिश्रम का नतीजा है। यहाँ की सारी इमारतें ही खड़ी की हैं। भदन्त जी यहाँ से केवल टिकट के पैसे लेकर बाहर निकलते थे। बाहर से लाया पूरा धन उन्होंने समिति में लगाया। साथ ही समिति के कार्यों को अच्छी गति दी।
भदन्त जी ने यहाँ ग्यारह साल रहकर जातक कथाओं के साथ पालि का बहुत सारा अनुवाद कार्य किया एवं बुध्द धम्र पर अनेक पुस्तकें लिखी। यह बात कबूल करनी होगी कि भदन्त जी ने हिन्दी साहित्य का सृजनात्मक लेखन नहीं किया मगर उन्होंने हिन्दी पढ़ने वाले जरूर तैयार किए। आज देश के करोड़ों विद्यार्थी हिन्दी पढ़-लिा रहे हैं। उन्होंने हिन्दी के लिए पाठक तैयार किए यह उनकी बुनियादी राष्ट्रभाषा हिन्दी सेवा है।
मैं मिर्झापुर से और मुंबई से होकर यहाँ वर्धा आकर हिन्दी राष्ट्रीय कार्य कर रहा हँ। बिना पैसे लेकर यहाँ कार्य करने की प्रेरणा मुझे भदन्तजी से प्राप्त हुई। भदन्त जी ने किसी से कुछ लिया नहीं। समाज को दिया ही दिया है। यह बात मुझे अधिक प्रभावित करती है। शायद मायानगरी मुबंई छोड़कर यहाँ आया उसके पीछे यही भावना काम कर रही थी।

भदन्तजी का मानना था कि परस्पर प्रेम और सौहार्द्र से हिन्दी भाषा का प्रचार-प्रसार करना ठीक होगा। यही भावना मेरी भी है। ऐसे महान विभूति को उनकी जन्मशताब्दी के अवसर पर मेरा एवं राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा द्वारा विनम्र अभिवादन है।

अन्तरराष्ट्रीय बौध्द विद्वान और हिन्दी के साहित्यकार डॉ. भदन्त आनंद कौसल्यायन का जन्म पंजाब के सुहाना चंडीगढ़ के निकटध्द नामक गांव में हुआ था। उनके पिता श्री रामशरणदास अंबाला के हिन्दू मोहनमडन हायस्कूल में प्रधानाचार्य थे। डॉ. भदन्त आनंद कौसल्यायन के बचपन का नाम हरिनाम दास था।
हरिनामदास, लाला लाजपतराय के विश्वविद्यालय में क्रान्तिकारी शहीदे आजम भगत सिंह, सुखदेव और यशपाल के सहपाठी थे। 19 वर्ष की उम्र में स्नातक हुए और स्वाधीनता संग्राम से जुड़े। 21 वर्ष की आयु में उन्होंन गृहत्याग किया। उन्हें परिव्राजक बनाने का श्रेय प्रसिध्द घुमक्कड़ राहुल सांस्कृत्यायन को है। वे सन् 1928 में जब उनकी उम्र 23 वर्ष थी श्रीलंका पहुँचे और वहाँ उन्होंने उपसम्पदा प्राप्त की तथा त्रिपटक का अध्ययन किया। तब से वे डॉ. भदन्त आनंद कौसल्यायन बन गए। 1932 में वे धर्मदूत के उपाध्यक्ष भी रहे। उसी दौरान जापान, थाइलैण्ड की यात्राएँ की।

आनन्द जी ने बौध्द जातकों का हिन्दी अनुवाद किया। हिन्दी में एक विशिष्ट शैली के साहित्य सृष्ठा थे। हिन्दी में उन्होंने लगभग 100 पुस्तकें लिखी हैं। उनकी हिन्दी सेवा के उपलक्ष्य में उन्हें विद्यालंकार विश्वविद्यालय, श्रीलंका से मानद डी.लिट्. की उपाधि प्राप्त हुई। वे नागपुर विश्वविद्यालय की सीनेट के भी सदस्य रहे। हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग ने उन्हें साहित्य वाचस्पति' की उपाधि से सम्मानित किया। नालंदा विश्वविद्यालय की ओर से पाली और बौध्द धर्म की सेवा के लिए उन्हें विद्यावाश्धि की उपाधि प्रदान की गई।

राष्ट्र भाषा प्रचार समिति को आनन्दी जी का योगदान-

आनन्द जी लगभग दस वर्ष तक समिति के प्रधान मंत्री रहे। बड़ी विषम परिस्थितियों में उन्होंने समिति का कार्यभार संभाला। उस समय राष्ट्रभाषा के लिए गांधीजी नागरी के साथ-साथ उर्दूवाली अरबी-फारसी लिपि का आग्रह कर रहे थे। टंडन जी और गांधीजी ने यह मत-भिन्नता इतनी बढ़ी कि गांधीजी ने सम्मेलन तथा समिति की सदस्यता से त्यागपत्रा दे दिया और हिन्दुस्तानी प्रचार सभा नाम से एक अलग संस्था स्थापित कराई। काका कालेलकर तथा श्रीमन्नारायण्ा जैसे अत्यन्त महत्तवपूर्ण कर्ता-धर्ता समिति से अलग हो गए। प्रान्तीय समितियों में भी इसका बहुत प्रतिकूल प्रभाव हुआ। समिति के पास धन का एकदम अभाव हो गया। उसे अपना बाग-बनाया कार्यालय छोड़ना पड़ा और अपना अध्यापन कार्य बंद करना पड़ा। ऐसी विकट परिस्थिति में डॉ. भदन्त आनंद कौसल्यायन ने अपूर्व साहस एवं अध्यवसाय से समिति का सुदृढ़ आधारभूत ढाँचा तो तैयार किया ही, बल्कि भविष्य के विकास की बहुआयामी प्रवृत्तिायों का रोपण और पल्लवन भी किया।

केलानिया विश्वविद्यालय, श्रीलंका
केलानिया विश्वविद्यालय, श्रीलंका का एक राष्ट्रीय विश्वविद्यालय है। जिसकी स्थापना सन् 1959 में विद्यालंकार परिवेण, सिलोन के रूप में हुई थी। सन् 1976 में संसद के विशेष अधिनियम द्वारा इसका नामकरण केलानिया विश्वविद्यालय, श्रीलंका किया गया है।
श्रीलंका के प्रमुख राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के रूप में अपनी पहचान कायम करने वाले इस विश्वविद्यालय का इतिहास भाषा अध्ययन के लिए विशेष जाना जाता है। यह अपने प्रत्येक अध्येता की ज्ञान बुध्दि के लिए तमाम अकादिमक सुविधाएँ प्रदान करने के साथ-साथ उचित सुअवसर भी प्रदान करता है।
विश्व भर में बौध्द -धम्म-दर्शन के अध्ययन करने वाले जिज्ञासु अध्येताओं के लिए पालि, संस्कृत, सिंहली और तमिल में शोध के लिए अकादमिक सुविधाएँ तथा श्रीलंका की सामाजिक, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का आकलन भी कराया जाता है। भाषा अध्ययन के लिए अनुवाद, निर्वचन तथा भाषा-विज्ञान के द्वारा इन भाषाओं का प्रयोग कितना अधिक सार्थक किया जाए विश्वविद्यालय इस दिशा में भी अग्रेसर है।

डॉ. भदन्त आनन्द कौसल्यायन पीठ के अन्तर्गत केलानिया विश्वविद्यालय, श्रीलंका की भूमिका-

  •  डॉ. भदन्त आनन्द कौसल्यायन बौध्द  अध्ययन पीठ के विकास में केलानिया विश्वविद्यालय प्रत्येक संभव प्रयास करेगा।

  • बौध्द -साहित्य एवं बौध्द -दर्शन पर लघु पाठयक्रमों का संयोजन।

  •  दोनों विश्वविद्यालय अपने छात्रों एवं अध्यापकों का आदान-प्रदान करेंगे।

  • केलानिया विश्वविद्यालय अपने बौध्द  विद्वानों को अध्ययन पीठ के अध्यापन तथा शोध हेतु भेजेगा। जबकि महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय अपने यहाँ हिन्दी अध्यन       के लिए केलानिया विश्वविद्यालय, श्रीलंका के छात्रों को आमंत्रित करेगा।

  • केलानिया विश्वविद्यालय से आने वाले अतिथि अध्यापकों को महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, आवासीय सविधा प्रदान करेगा तथा नियमानुसार केलेनिया     विश्वविद्यालय इसके खर्च वहन करेगा।

  •  इसी प्रकार केलानिया, महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा में हिन्दी अध्ययन के लिए केलानिया से आने वाले छात्रों को रहने की आवासीय व्यवस्था मुफ्त होगी। जबकि पाठयक्रम की राशि महात्मा गांधी अन्ततरराष्ट्रीय, वर्धा के अनुसार निर्धारित की जाएगी।

  • महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में हिन्दी अध्ययन के लिए केलानिया से आने वाले छात्रों को रहने की आवासीय व्यवस्था मुफ्त होगी। जबकि पाठयक्रम की राशि महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वधा्र के अनुसार निर्धारित की जाएगी।

  • जो छात्र बौध्द  साहित्य एवं दश्रन का अध्ययन केलानिया विश्वविद्यालय में करना चाहते हैं। उन्हें केलानिया विश्वविद्यालय आवासीय खर्च से मुक्त रखेगा। जबकि पाठयक्रम की राशि केलानिया विश्वविद्यालय द्वारा निर्धारित की जायेगी।

  •  केलानिया विश्विद्यालय और महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के अध्येता एवं छात्र अनुवाद कार्य संयुक्त तत्वावधान में करेंगे। जो बौध्द  साहित्य सिंहली में उपलब्ध है इसे महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय को केलानिया विश्वविद्यालय श्रीलंका द्वारा दिया जायेगा, ताकि महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय इसे प्रकाशित कर हिन्दी में बौध्द  साहित्य की महत्तवपूर्ण सामग्री ला सके।

  •  इसी तरह सिंहली अनुवाद तथा हिन्दी में बौध्द साहित्य का अध्ययन किया जायेगा। जिसका प्रकाशन का खर्च केलानिया विश्वविद्यालय वहन करेगा।


केलानिया विश्वविद्यालय तथा महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की संयुक्त भूमिका

  • महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में हिन्दी में बौध्द साहित्य के अध्ययन के लिए अपने श्रीलंकाई छात्रों का चुनाव केलानिया विश्वविद्यालय करेगा।

  •  केलानिया में पाली तथा बौध्द साहित्य के अध्ययन हेतु जाने वाले भारतीय छात्रों का चुनाव महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय करेगा।

पाठयक्रम हेतु प्रस्तावित बिन्दु

 महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय तथा केलानिया विश्वविद्यालय, श्रीलंका के संयुक्त प्रयास से 'डॉ. भदन्त आनंद कौसल्यायन बौध्द  अध्ययन पीठ, के अन्तर्गत एक वर्ष्ािय पी. जी. डिप्लोमा प्रारंभ किया जायेगा। जिसमें अध्ययन, अध्यापन का माध्यम हिन्दी होगा। यह एक वर्ष्ािय पी. जी. डिप्लोमा पाठयक्रम बौध्द साहित्य, इतिहास, दर्शन, संप्रदाय एवं महत्तवपूर्ण बौध्द  दार्शनिकों के चिन्तन पर आधारित होगा।

अध्यापक गण

नाम डॉ. मधुकर ल. कासारे
पद कार्यकारी निदेशक
शैक्षणिक योग्यता  
पता म.ग.हि.वि.वि, वधा
अनुभव

   
नाम संदीप मधुकर सपकाले
पद  व्याख्याता
शैक्षणिक योग्यता  
पता म.ग.हि.वि.वि, वधा
अनुभव

   

Admission Notice 2008-09

Click Here to down load the Application form

Copyright © 2007 Mahatma Gandhi Antarrashtriya Hindi Vishwavidyalaya, Wardha. All Rights Reserved.